Sunday, April 12, 2020

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कोरोनावायरस से अमेरिका में 5 लाख 30 हजार से ज्यादा लोग संक्रमित हैं और 21 हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। दुनिया में कोरोनावायरस की वजह से अमेरिका के लोग सबसे ज्यादा चिंतित हैं। अमेरिकी संस्था वंडरमैन थॉम्पसन डेटा के एक सर्वे में भी इसी बात का खुलासा हुआ है। इस संस्था ने दुनिया के सबसे ताकतवर देश के युवाओं के बीच मार्च में एक सर्वे कराया था। इसमें युवाओं से कोरोना, इससे बचाव और महामारी खत्म होने के बाद की स्थिति के बारे में सवाल किए गए। सर्वे के आधार पर पता चला कि अमेरिका में बुजुर्गों की तुलना में 18 से 24 साल के युवा कोरोना को लेकर पांच गुना चिंतित हैं। 77% लोग हर दो घंटे में हाथ धो रहे हैं। 52% ने नाइट क्लब और 66% ने बार और रेस्त्रां जाना छोड़ दिया है। 68% ने तो हाथ मिलाना भी बंद कर दिया है। पढ़िए सर्वे की कुछ अहम बातें...

अमेरिकी लोग एक समय में एक ही चीज के बारे में चिंतित होते हैं
सर्वे करने वाली संस्था वंडरमैन थॉम्पसन डेटा के मुख्य रिसर्चर मार्क ट्रस के अनुसार, अमेरिकी आमतौर पर एक समय में केवल एक विषय के बारे में चिंतित होते हैं। लेकिन कोरोनावायरस ने लोगों को तीन-तीन मोर्चे पर परेशान होने को मजबूर कर दिया है। इसमें सेहत, नौकरी और इकोनॉमी शामिल है। यह संस्था इससे पहले 2003 में इराक युद्ध, 2008 की वैश्विक मंदी और 2009 में एच1एन1 महामारी के दौरान सर्वे कर चुकी है। इराक युद्ध के दौरान 37%, वित्तीय संकट के दौरान 27%, एच1एन1 महामारी के दौरान केवल एक प्रतिशत लोगों ने चिंता जताई थी। मार्क कहते हैं, ‘कोराना से जुड़े सर्वे में अभी जो रिस्पॉन्स मिले हैं, उसके हिसाब से चिंता का स्तर 36% ही है। लेकिन इराक युद्ध और कोरोना में फर्क है। अभी संक्रमण और मृत्युदर लगातार बढ़ रही है। युवाओं का चिंतित होना स्वाभाविक है।’

न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया, वॉशिंगटन और मिशिगन में लोगों को नौकरी की चिंता
सर्वे के अनुसार न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया, वॉशिंगटन और मिशिगन राज्य के लोग ज्यादा चिंतित दिखे। हालात यदि जल्द नहीं सुधरे तो आने वाले हफ्तों और महीनों में चिंता का स्तर और बढ़ेगा। सर्वे में हिस्सा लेने वाले इन राज्यों के लोग खाने की चीजों की उपलब्धता, धीमी इंटरनेट बैंडविड्थ और अशांति जैसे मुद्दे की बजाय लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट और नौकरी खोने जैसे विषयों पर ज्यादा चिंतित दिखे। एक और बात सामने आई कि पुरानी सोच रखने वालों की तुलना में उदार नजरिया रखने वालों में कोरोना काे लेकर फिक्र ज्यादा है।

कोरोनावायरस पर सर्वे में अमेरिकियों से पूछे गए सवाल और उनके जवाब
क्या आप लगातार हाथ धो रहे हैं?
77% ने स्वीकारा, हर दो घंटे में।

आप घर से कब-कब बाहर निकल रहे हैं?
71% ने कहा- बहुत कम, शायद हफ्ते में एक बार।

नाइट क्लब जाते हैं?
52% ने कहा- वे नाइट क्लब जाना बंद कर चुके हैं

दोस्तों और रिश्तेदारों से मुलाकात होने पर गले मिलते हैं या फिर गाल चूमते हैं?
61% ने कहा- वे न तो गले मिल रहे हैं और न किस कर रहे हैं।

हाथ मिलाते हैं?
68% ने स्वीकारा- हाथ मिलाने से कतरा रहे।

क्या आप मॉल से खरीददारी कर रहे हैं?
68% ने कहा- नहीं, वे मॉल जाने से बच रहे हैं।

क्या आप सैनिटाइजर का प्रयोग करते हैं?
59% ने कहा- हां, बार-बार।

संभव हो तो क्या आप घर से काम करना पसंद करेंगे?
63% ने कहा- नहीं, वे घर से काम नहीं कर सकते।

बार या रेस्त्रां जाते हैं?
66% ने कहा- वे बार और रेस्त्रां जाना छोड़ चुके हैं।

पब्लिक ट्रांसर्पोटेशन का इस्तेमाल कर रहे हैं?
56% ने कहा- नहीं। वे इससे बचते हैं।



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In America, young people between 18 and 24 years of age are worried about Corona 5 times, 77% of people wash their hands every 2 hours


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ट्रायल सफल रहा तो जल्द ही कोरोना मरीजों का इलाज कोंवालेसेंट प्लाज्मा थैरेपी से किया जा सकता है। हाल ही में इंस्टीट्यूट को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकलरिसर्च (आईसीएमआर) ने केरल के एक इंस्टीट्यूट को इसके ट्रायल की अनुमति दी है। यह खास किस्म थैरेपी है। जिसमें कोरोना से उबर चुके मरीजों से ब्लड लिया जाता है और उसमें मौजूद एंटीबॉडीज को नए कोरोना के मरीजों में चढ़ाया जाता है।

जापान में सबसे बड़ी फार्मा कंपनी टाकेडा भी इसी थैरेपी का ट्रायल कर रही है। टाकेडा का दावा है यह दवा कोरोना के मरीजों के लिए काफी कारगर साबित होगी। तर्क है कि रिकवर मरीजों से निकली एंटीबॉडी नए कोरोना मरीजों में पहुंचेगी और उनके इम्यून सिस्टम में तेजी से सुधार करेगी।सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपने ब्लॉग में बताया इस थैरेपी का ट्रायल केरल के श्री चित्र तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में होगा। इंस्टीट्यूट की डायरेक्टर डॉ. आशा किशोर ने ब्लॉग में इस थैरेपी के बारे में कई अहम जानकारियां दी हैं। जानिए इनके बारे में...


#1)कैसे काम करती है यह थैरेपी
ऐसे मरीज जो हाल ही में बीमारी से उबरे हैं उनके शरीर में मौजूद इम्यून सिस्टम ऐसे एंटीबॉडीज बनाता है जो ताउम्र रहते हैं। ये एंटीबॉडीज ब्लड प्लाज्मा में मौजूद रहते हैं। इसे दवा में तब्दील करने के लिए ब्लड से प्लाज्मा को अलग किया जाता है और बाद में इनसे एंटीबॉडीज निकाली जाती हैं। ये एंटीबॉडीज नए मरीज केशरीर में इंजेक्ट की जाती हैं इसे प्लाज्मा डेराइव्ड थैरेपी कहते हैं। यह मरीज के शरीर को तब तक रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाता है जब तक उसका शरीर खुद येतैयार करने के लायक न बन जाए।

#2)एंटीबॉडीज क्या होती हैं?
ये प्रोटीन से बनीं खास तरह की इम्यून कोशिशकाएं होती हैं जिसे बी-लिम्फोसाइट कहते हैं। जब भी शरीर में कोई बाहरी चीज (फॉरेन बॉडीज) पहुंचती है तो ये अलर्टहो जाती हैं। बैक्टीरिया या वायरस द्वारा रिलीज किए गए विषैले पदार्थों को निष्क्रिय करने का काम यही एंटीबॉडीज करती हैं। इस तरह ये रोगाणुओं के असर को बेअसर करती हैं। जैसे कोरोना से उबर चुके मरीजों में खास तरह की एंटीबॉडीज बन चुकी हैं जब इसे ब्लड से निकालकर दूसरे संक्रमित मरीज में इजेक्ट किया जाएगा तो वह भी कोरोनावायरस को हरा सकेगा।

#3)ये एंटीबॉडीज मरीज के शरीर में कितने समय तक रहेंगी?
कोरोना मरीज को एंटीबॉडी सीरम देने के बाद यह उनके शरीर में 3 से 4 दिन तक रहेंगी। इस दौरान ही मरीज रिकवर होगा। चीन और अमेरिका की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, प्लाज्मा का असर शरीर में 3 से 4 दिन में दिख जाता है।

#4) यह थैरेपी कितनी सुरक्षित है?
कोरोना सर्वाइवर की हेपेटाइटिस, एचआईवी और मलेरिया जैसी जांचों के बाद ही रक्तदान की अनुमति दी जाएगी। इस रक्त से जिस मरीज का ब्लड ग्रुप मैच करेगा उसका ही इलाज किया जाएगा। इस तरह किसी तरह का संक्रमण फैलने या मरीज को दिक्कत होने का खतरा न के बराबर है।

#5) किसे मिलेगा यह ट्रीटमेंट?
शुरुआत में यह ट्रीटमेंट कोरोना के कुछ हीमरीजों पर किया जाएगा, खासकर जिनकी हाल ज्यादा नाजुक होगी। बतौर क्लीनिकल ट्रायल ऐसा होगा। इसके लिए हम पांच मेडिकल कॉलेज से करार भी कर रहे हैं।

#6) यह थैरेपी वैक्सीन से कितनी अलग होगी?
वैक्सीन लगने पर शरीर का रोग प्रतिरोधी तंत्र एंटीबॉडीज रिलीज करता है ताकि संक्रमण होने पर ये उस खास किस्म के बैक्टीरिया या वायरस को निष्क्रिय कर दें। ऐसा ताउम्र होता है। लेकिन इस थैरेपी में जो एंटीबॉडीज दी जा रही हैं वह स्थायीतौर पर ताउम्र नहीं रहेंगी।

#7) यह थैरेपी कितनी प्रभावी है?
बैक्टीरिया से संक्रमण होने पर हमारे पास एंटीबायोटिक्स रहती हैं लेकिन किसी नए वायरस का संक्रमण या महामारी फैलने पर एंटीवायरल तुरंत उपलब्ध नहीं होता। 2009-2010 में एच1एन1 इंफ्लुएंजा की महामारी के समय भी कोंवालेसेंट प्लाज्मा थैरेपी का प्रयोग किया गया था। इसके काफी बेहतर परिणाम मिले थे। संक्रमणको कंट्रोल किया गया था, मौत के मामलों में कमी आई थी। यही थैरेपी 2018 में इबोला महामारी के समय भी मददगार साबित हुई थी।

#8) इस थैरेपी के प्रयोग में कितनी चुनौतियां हैं?
यह थैरेपी आसान नहीं है। कोरोना सर्वाइवर के ब्लड से पर्याप्त मात्रा में प्लाज्मा निकालकर बढ़ते संक्रमित लोगों के मुकाबले इकट्‌ठा करना चुनौती है। कोरोना सेसंक्रमित ऐसे मरीजों की संख्या ज्यादा है जो उम्रदराज हैं और पहले ही किसी बीमारी जैसे हाईबीपी और डायबिटीज से जूझ रहे हैं। ये सभी सर्वाइवर के ब्लड डोनेशनसे रिकवर नहीं हो सकते।



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What is convalescent plasma therapy whose trial has started in Kerala, Expert; This is the treatment method for the patient who has recovered from the corona


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(सलीम वलजी)33 साल के मायरोन रोले अमेरिका की नेशनल फुटबॉल लीग (एनएफएल) में टेनेसी टाइटंस की ओर से खेलते थे। 2013 में उन्होंने खेलना छोड़ दिया और फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिसिन में दाखिला लिया। 2017 में वे ग्रेजुएट हुए। अब मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से न्यूरोसर्जरी की पढ़ाई कर रहे। यहां वे कोविड-19 के मरीजों को भी ट्रीटमेंट दे रहे हैं। वे इमरजेंसी रूम के डॉक्टरों वाली टीम में हैं। वे और उनके साथी 24-24 घंटे सेवा दे रहे हैं।

रोले कहते हैं, ‘हमें सुबह 4-5 बजे से काम शुरू करना पड़ता है। सभी मरीजों को देखने के बाद उनकी पूरी डिटेल लेकर उसे हमारी जगह आने वाले डॉक्टर को बताने का काम भी जुड़ गया है। ऐसे में 24 घंटे काम करना पड़ रहा है। बीच में एक-दो घंटे की नींद ले पाएं तो खुद को खुशकिस्मत समझते हैं।’ रोले कहते हैं, ‘यहां मुझे परेशानी नहीं आती क्योंकि फुटबॉल ने मुझे अनुशासन, फोकस, कड़ी मेहनत, निष्ठा, टीमवर्क और प्रतिकूल परिस्थितियों से उबरना सिखाया है।’

चार बार की ओलिंपिक चैंपियन हेले मेडिकल उपकरण जुटा रही

कनाडा की हेले विकेनहेसर चार बार की ओलिंपिक गोल्ड मेडलिस्ट हैं। पूर्व आइस हॉकी खिलाड़ी हेले अब यूनिवर्सिटी ऑफ केलगेरी से मेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं। वे बताती हैं, ‘जब वे 10 साल की थीं, तब उन्होंने दो सपने देखे थे। एक तो प्राेफेशनल हॉकी खेलना और दूसरा डॉक्टर बनना। मेरा एक सपना तो पूरा हो गया है। अब दूसरा सपना पूरा कर रही हूं।’ 41 साल की हेले ने 2017 में आइस हॉकी से संन्यास ले लिया था। दो हफ्ते पहले तक वे टोरंटो में इमरजेंसी रूम में रोटेशन पर थीं। लेकिन जब देश में कोरोनावायरस से स्थिति खराब होने लगी, तब सभी मेडिकल स्टूडेंट और ट्रेनी को उससे निपटने के काम में लगा दिया गया। हेले ने कहा, ‘मेडिकल स्टूडेंट को कोविड-19 के मरीज के इलाज की अनुमति नहीं है। इसलिए हमें पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) जुटाने के काम में लगा दिया गया। इसके अलावा हम उन मरीजों को भी ट्रेस कर रहे हैं, जो संक्रमित हैं।’ हेले कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के ऑफिस से लगातार संपर्क में हैं औरकनाडा में सोशल डिस्टेंसिंग एडवाइजरी को प्रमोट करने में भी मदद कर रही हैं।



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33 साल के मायरोन रोले अमेरिका की नेशनल फुटबॉल लीग (एनएफएल) में टेनेसी टाइटंस की ओर से खेलते थे।


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(एडम सेटारिआनो और डेवी अल्बा)जानलेवा कोरोना वायरस फैलाव के बीच सोशल मीडिया पर 5 जी टेक्नोलॉजी के खिलाफ जमकर अभियान चल रहा है। फेसबुक ग्रुप, व्हाट्सएप संदेशों और यूट्यूब पर यह गलत प्रचार हो रहा है कि 5 जी टेक्नोलॉजी की रेडियो तरंगों से लोगों के शरीर में परिवर्तन होते हैं इसलिए वह वायरस का शिकार हो जाता है। ब्रिटिश अधिकारियों ने बताया कि देश में इस माह वायरलैस टॉवर जलाने की 30 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं। टेलीकॉम टेक्नीशियन को परेशान करने की 80 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं। ब्रिटेन के बर्मिंघम, लिवरपूल सहित कई स्थानों और उत्तर आयरलैंड के बेलफास्ट में ऐसी घटनाएं हुई हैं।

5जी उपकरणों की खास सुरक्षा के आदेश दिए

23 मार्च को ब्रिटिश सरकार ने 5जी उपकरणों की खास सुरक्षा के आदेश जारी कर दिए हैं। इन घटनाओं से पता लगता है कि वास्तविक दुनिया में कोरोना वायरस साजिश का कैसा अंधा प्रचार किया जा रहा है। गलत प्रचार अभियान पर रिसर्च करने वाले विशेषज्ञों का कहना है, कोरोना वायरस से पहले कभी ऐसे अभियान ने इतनी जल्दी बहुत नुकसान नहीं पहुंचाया है। ब्रूसेल्स स्थित यूरोपियन यूनियन डिसइंफो लैब के डायरेक्टर अलेक्सांड्रे अलाफिलिपे कहते हैं, साजिश रचने वाले ऐसे अधिकतर अभियान ऑनलाइन सीमित रहते हैं लेकिन यह वास्तविक दुनिया में पहुंच गया है। उन्होेंने इसे नई समस्या बताया है।
58 लाख बार देखे गए प्रचार वाले वीडियो

5जी कोरोना वायरस प्रचार के 10 सबसे लोकप्रिय वीडियो को यूट्यूब पर 58 लाख बार देखा गया। स्विटजरलैंड, उरुग्वे, जापान सहित 30 देशों में फेसबुक पर यह अभियान देखा जा सकता है। कोरोना वायरस से संबंधित ऑनलाइन गलत सूचनाओं की जांच करने वाली समिति की सदस्य ब्रिटिश सांसद जूलियन नाइट का कहना है, फेसबुक, यूट्यूब को स्थिति पर नियंत्रण पाने की कोशिश करनी चाहिए।
यूट्यूब अब ऐसे वीडियोकम करेगा

इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप की मालिक फेसबुक का कहना है, उसने कोविड-19 फैलाने में 5 जी टेक्नोलॉजी की भूमिका होने के दावों को हटाना शुरू कर दिया है। यूट्यूब ने कहा है, वह ऐसे वीडियो कम करेगा। टि्वटर का कहना है, उसने बीमारी के बारे में भ्रामक और नुकसानदेह कंटेंट के खिलाफ कार्रवाई की है। 5 जी टेक्नोलॉजी के खिलाफ राजनीतिक स्तर पर चले अभियान को इंटरनेट ट्रोल्स ने पकड़ लिया है।
चीन में वायरस बढ़ने के साथ 5जी ट्रोल होना शुरु हुआ

जनवरी में वुहान, चीन में वायरस का प्रकोप बढ़ने के साथ 5जी विरोधी ट्रोल शुरू हो गए थे। 19 जनवरी को टि्वटर पर एक पोस्ट में बीमारी को 5जी से जोड़ने की अटकल लगाई गई। मीडिया इनसाइट कंपनी जिगनल लैब्स के अनुसार इस साल 7 अप्रैल तक ऐसा प्रचार छह लाख 99 हजार बार किया गया। ट्वीट में कहा गया, वुहान में पांच हजार से अधिक 5जी बेस स्टेशन हैं। 2021 तक 50 हजार हो जाएंगे। यह बीमारी है या 5जी। बेल्जियम न्यूज वेबसाइट पर एक डॉक्टर के हवाले से बताया गया कि 5जी जनता की सेहत को नुकसान पहुंचाता है।



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5G tech blamed for spreading epidemic on social media, burning mobile towers in UK


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(एरिक लिप्टन, डेविड सेंगर, मैगी हैबरमैन, माइकेल शीयर, मार्क मजेटी, जूलियन बार्न्स) कोरोनावायरस की महामारी से निपटने में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की लापरवाही के सबूत लगातार सामने आ रहे हैं। संक्रमण का पहला मामला पता लगने से पहले पूर्व सैनिक विभाग के वरिष्ठ मेडिकल सलाहकार डॉ. कार्टर मेचर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से कड़े कदम उठाने का आग्रह कर रहे थे। उन्होंने 28 जनवरी को सरकार और विश्वविद्यालयों के स्वास्थ्य विशेषज्ञों को एक ई-मेल में लिखा था, बीमारी के विस्तार और नतीजों पर विश्वास करना मुश्किल लग रहा है। राष्ट्रपति के एक सलाहकार ने 29 जनवरी को वायरस से 5 लाख से अधिक मौतों की आशंका जताई थी। लेकिन, सोशल डिस्टेंसिंग सहित अन्य जरूरी फैसले मार्च के मध्य में लिए गए।

ट्रम्प ने वायरस की गंभीरता को नजरअंदाज किया

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प नेजनवरी में बार-बार वायरस की गंभीरता को नजरअंदाज किया। उनका फोकस अन्य मामलों पर था। व्हाइट हाउस के उच्च सलाहकारों, विभिन्न विभागों और खुफिया एजेंसियों ने खतरे के संबंध में चेतावनी भी दी। आक्रामक कार्रवाई की सिफारिश की। लेकिन, ट्रम्प खतरे के संदेशों पर पानी डालते रहे। उन्हें अर्थव्यवस्था की अधिक चिंता थी।

ट्रम्प नेजनवरी के अंत में चीन से आवाजाही को सीमित करने का पहला ठोस कदम उठाया था। कांग्रेस से जरूरी मेडिकल सामान, टेस्टिंग के लिए पैसे की मंजूरी लेने के फैसले में ढील दी गई। संसद में महाभियोग की कार्रवाई के कारण ट्रम्प सरकार में बैठे लोगों पर संदेह कर रहे थे।

ठंडे बस्ते में डाला गया वायरस के निपटने का मामला

चीन से निपटने के सवाल पर भी ट्रम्प प्रशासन में गहरे मतभेद रहे। व्यापार वार्ता के दौरान चीन को अस्त-व्यस्त न करने के कारण वायरस का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। न्यूयॉर्क टाइम्स ने दर्जनों पूर्व और वर्तमान अधिकारियों से बातचीत, ई-मेल और अन्य दस्तावेजों की समीक्षा से जानलेवा वायरस से निपटने में देर की प्रक्रिया का पता लगाया है।

11 करोड़ लोगों के संक्रमित होने का अनुमान लगाया था

फरवरी के अंतिम सप्ताह में डा. कैडलेक की अगुआई में एक टास्क फोर्स ने 11 करोड़ लोगों के कोरोना वायरस से संक्रमित होने, 77 लाख लोगों के अस्पताल में भर्ती होने और पांच लाख 86 हजार मौतों का अनुमान लगाया था। टास्क फोर्स के सदस्य राष्ट्रपति से तत्काल मिलना चाहते थे लेकिन राष्ट्रपति भारत यात्रा पर निकल गए। 25 फरवरी को जब ट्रम्प एयरफोर्स वन विमान से भारत से लौट रहे थे तब नेशनल इम्युनाइजेशन, रेस्पिरेटरी डिसीज सेंटर की डायरेक्टर डॉ. नेंसी मेसोनियर ने तबाही की सार्वजनिक चेतावनी जारी कर दी। इसके साथ ही शेयर मार्केट ढह गया।

बेवजह दहशत फैलाने पर ट्रम्प ने स्वास्थ्य सेक्रेटरी पर नाराजगी जताई

26 जनवरी को भारत लौटने पर ट्रम्प ने स्वास्थ्य सेक्रेटरी एलेक्स एजार से इस पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा-डा. मेसोनियर ने बेवजह दहशत फैला दी है। सोशल डिस्टेंसिंग टाल दी गई। फरवरी और मार्च की शुरुआत तक ट्रम्प सरकार ने मास्क और अन्य सुरक्षा उपकरणों के लिए ऑर्डर जारी नहीं किए थे। 16 मार्च को सोशल डिस्टेंसिंग के आदेश जारी करने के बाद भी राष्ट्रपति कहते रहे कि वे अस्थायी प्रतिबंधों को भी हटाना चाहते हैं।


देर से लिए गए सभी जरूरी फैसले

  • नेशनल सिक्योरिटी कौंसिल को जनवरी की शुरुआत में वायरस फैलने की कई खुफिया रिपोर्ट मिली थी।
  • कौंसिल ने कुछ समय बाद शिकागो जैसे शहरों में लॉकडाउन और अमेरिकियों के घर से काम करने के विकल्प सामने रखे थे।
  • 16 मार्च को देशभर में सोशल डिस्टेंसिंग लागू करने का निर्णय लिया गया। राष्ट्रपति कहते रहे कि अप्रैल में गर्मी बढ़ने पर वायरस गायब हो जाएगा।
  • स्वास्थ्य एवं मानव सेवाओं के सेक्रेटरी एलेक्स अजार 30 जनवरी तक ट्रम्प को महामारी फैलने की चेतावनी तीन बार दे चुके थे।
  • राष्ट्रपति के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने 29 जनवरी को एक मेमो में महामारी से लगभग 5 लाख मौतों और खरबों डॉलर के आर्थिक नुकसान का जिक्र किया था।


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राष्ट्रपति के एक सलाहकार ने 29 जनवरी को वायरस से 5 लाख से अधिक मौतों की आशंका जताई थी। लेकिन, सोशल डिस्टेंसिंग सहित अन्य जरूरी फैसले मार्च के मध्य में लिए गए।


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जल्द घर बैठे ही व्यक्ति कोरोना संक्रमण के लक्षणों की सही पड़ताल कर सकेगा। भारत समेत करीब 38 देशों के 500 वैज्ञानिकों ने एक प्रश्नावली तैयार की है। इससे आसानी से पता चल सकेगा कि किसी को कोविड-19 बीमारी है या आम फ्लू।दरअसल, दोनों बीमारियों के लक्षण कई मामलों में एक से हैं। इसलिए यह भांप पाना मुश्किल होता है कि कोविड का टेस्ट कराने की जरूरत है या नहीं।

वैज्ञानिकों ने जिस प्रश्नावली को तैयार किया है, वह एक तरह का सर्वे है। इसमें आपके किचन में उपलब्ध मसालों और बूटियों को चखकर आपको जवाब देना होगा। इसी के आधार पर परिणाम पता चलेगा।

डॉक्टरों का समूह सूंघने-स्वाद की शक्ति कम होने की थ्योरी पर काम कर रहा

भारत से सेंट्रल साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट ऑर्गेनाइजेशन (सीएसआईओ) के डॉ. रितेश कुमार, डॉ. अमोल पी. भोंडेकर और डॉ. रिशमजीत सिंह भी इस समूह में काम कर रहे हैं। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज और आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिक भी इसका हिस्सा हैं। समूह सांस की बीमारी होने पर सूंघने और स्वाद आने की शक्ति कम होने की थ्योरी पर काम कर रहा है।

संक्रमण में 30% मामलों में स्वाद और गंध लेने की क्षमता पर असर पड़ता है

इन दिनों रॉयल सोसायटी की फैलोशिप पर यूके में मौजूद डॉ. रितेश ने बताया कि सार्स के बाद दक्षिण कोरिया ने सबसे पहले इस पर स्टडी की थी। उसमें पता चला था कि ऐसे संक्रमण में 30% मामलों में स्वाद और गंध लेने की क्षमता पर असर पड़ता है। जिन देशों में एथिकल क्लीयरेंस मिल चुकी है, वहां अस्पतालों में भी इसे लागू किया जा चुका है। भारतीय वैज्ञानिकों ने भी सूंघने की क्षमता को चेक करने के लिए प्रश्नावली और एप तैयार किया है।

अप्रूवल का इंतजार
इसे भारत में लागू करने के लिए एथिकल अप्रूवल का इंतजार है। करीब डेढ़ दशक से स्वाद और सुगंध से जुड़े सेंसर पर काम कर रहे डॉ. अमोल ने बताया कि अप्रूवल के बाद इस प्रश्नावली या एप को भारत सरकार के आरोग्य सेतु के साथ जोड़ेंगे।



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एक तरह का सर्वे है। इसमें आपके किचन में उपलब्ध मसालों और बूटियों को चखकर आपको जवाब देना होगा।


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(पवन कुमार) कोरोनावायरस का खतरा कब तक देश में रहेगा, कितने लोगों को जद में लेगा, आगे यह अपनी प्रकृति में बदलाव करेगा या हमारे अंदर इस वायरस को झेलने की शक्ति पैदा हो जाएगी, कैसे भविष्य में इस पर काबू पाया जा सकता है। इन तमाम सवालों पर हमने दो विशेषज्ञों डॉ. चंद्रकांत एस. पांडव और डॉ. नरेंद्र अरोड़ा से विशेष बातचीत की। डॉ. पांडव ने दिल्ली एम्स में 40 साल और डॉ. अरोड़ा ने 35 साल काम किया है।

सवाल- देश में कब तक कोरोनावायरस का खतरा रहेगा। कितने लोग इससे प्रभावित हो सकते हैं?
जवाब- यह वायरस लंबे समय तक साथ रहेगा। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया गया तो इसके संक्रमण से हम लंबे समय तक बच सकते हैं। ऐसा न किया तो भविष्य में देश की 70 से 80% आबादी इस वायरस की चपेट में आ सकती है।

सवाल- 70 से 80% आबादी इस वायरस के चपेट में आई तो बाकी लोगों में क्या हर्ड इम्युनिटी विकसित हाेगी?
जवाब- हां, बड़ी आबादी वायरस से प्रभावित होने के कारण बाकी 20% लोगों में कोरोना से लड़ने की क्षमता यानी हर्ड इम्युनिटी पैदा हो जाएगी, लेकिन बड़ी आबादी एक साथ संक्रमित हुई तो हम उन्हें नहीं संभाल पाएंगे। सिर्फ रोकथाम से ही खतरा कम कर सकते हैं।

सवाल-कब तक सोशल डिस्टेंसिंग रखी जा सकती है। इतने बड़े देश में ऐसा करना कब तक संभव है?
जवाब-सोशल डिस्टेंसिंग से अच्छा विकल्प फिलहाल नहीं है। यह समय एक से डेढ़ साल हो सकता है। वैज्ञानिक कोरोना से बचाव के लिए वैक्सीन और दवा पर काम रहे हैं। जब तक ये नहीं बनती है,तब तक सोशल डिस्टेंसिंग और साफ-सफाई ही सबसे अच्छी दवा और वैक्सीन होगी। हालांकि, जान बचाने के लिए लोगों को बुनियादी चीजें उपलब्ध कराना होगा। इसके लिए देश को इमरजेंसी कॉरिडोर बनाना चाहिए।

सवाल-क्या भारत में जांच कम हो रही है?
जवाब- शुरुआती दौर से ही ज्यादा जांच होनी चाहिए थी। जांच का दायरा अब और बढ़ाना चाहिए, क्योंकि अब तो ऐसे मरीज आ रहे हैं जिनमें कोई लक्षण नहीं दिखे थे। अलग-अलग राज्यों के जिलों में रैंडम सैंपलिंग करके जांच होनी चाहिए। इससे निष्कर्ष निकलेगा कि वायरस कहां और किस रूप में फैला हुआ है। इससे आगे की रणनीति तैयार करने में मदद मिलेगी। राजस्थान का भीलवाड़ा मॉडल इसका उदाहरण है।



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तस्वीर दिल्ली की है। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवान फेसमास्क बनाते हुए नजर आ रहे हैं।


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