Saturday, August 29, 2020

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बद्रीनारायण भद्र, जब ये नाम आप गूगल पर सर्च करेंगे तो पहले ही नंबर पर इनके यूट्यूब चैनल का एड्रेस आएगा। पांच साल में बद्रीनारायण के यूट्यूब चैनल पर 15 लाख 60 हजार से भी ज्यादा सब्सक्राइबर हैं और वे हर महीने यूट्यूब से 60 से 70 हजार रुपए कमाते हैं। बद्री ओडिशा के जैजपुर जिले के एक छोटे से गांव जहल में रहते हैं। क्या है यूट्यूब पर उनकी सफलता की कहानी, जानिए उन्हीं की जुबानी।

जियो ने 4जी लॉन्च किया, तब वीडियो बनाना शुरू किए

मैं फिल्म लाइन से रहा हूं। 2000 से 2004 तक मैंने दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में थियेटर में काम किया। फिर 2004 से 2016 तक मुंबई में फिल्म डायरेक्शन की टीम में काम किया। 2016 में अपने गांव लौट आया। जब फिल्मों के लिए काम करता था तो यूट्यूब पर ही हम लोगों के गाने और ट्रेलर रिलीज होते थे इसलिए मुझे इसका आइडिया था। लेकिन, यूट्यूब से कमाई कैसे की जा सकती है, यह 2016 तक नहीं पता था। ये जरूर पता था कि इससे कमाई की जा सकती है।

बद्रीनारायण के गांव में लंगूर बहुत हैं। उन्होंने पहला वीडियो लंगूरों का ही बनाया था।

2016 में जब जियो ने 4जी लॉन्च किया तो गांव में मैंने ही सबसे पहले जियो की सिम खरीदी थी। उस समय तक मुझे यूट्यूब से कमाई का कोई बहुत ज्यादा आइडिया नहीं था। हमारे गांव में लंगूर बहुत होते हैं। हर तीन से चार दिन में लंगूरों का झुंड हमारे घर में होता है। लंगूर पूरे गांव में घूमते हैं। मेरी पत्नी मोनालिसा लंगूरों को कई सालों से मूंगफली खिला रही थी।

एक दिन वो हमेशा की तरह मूंगफली खिला रही थी तो मैंने उसका वीडियो बना लिया। वीडियो बनाने के बाद मुझे लगा कि यह यूट्यूब पर अपलोड करना चाहिए। फिर मैंने 19 मई 2016 को खुद के नाम से अपना यूट्यूब चैनल बनाया। चैनल कैसे बनाना है, ये भी यूट्यूब से ही सीखा। चैनल बनाने का क्राइटेरिया क्या होता है, वो पूरा पढ़ा और चैनल बना लिया।

पत्नी का जो वीडियो बनाया था, वो अपलोड कर दिया। फिर मैं हर एक-दो दिन में पत्नी के वीडियो अपलोड कर देता था। पूरा वीडियो जियो फोन से ही बनाता था। फिर जो एडिटिंग के फ्री सॉफ्टवेयर हैं, जैसे फिल्मोरा, उससे मोबाइल पर ही एडिटिंग कर लेता था और वीडियो अपलोड कर देता था।

2017 आते-आते तक मैं 30 से 40 वीडियो अपलोड कर चुका था। एक वीडियो को शूट करने और अपलोड करने तक में दो से तीन घंटे का समय लगता था। फिर अपने आप ही वीडियो पर व्यूज बढ़ने लगे। इनके प्रमोशन के लिए मैंने अलग से कुछ नहीं किया। बस मेरा कंटेंट यूनिक था। जब व्यूज आने लगे तो मैंने चैनल को मोनेटाइज कर दिया।

इसके बाद विज्ञापन आने लगे और अपने आप व्यूज बढ़ने लगे। मुझे आज भी याद है कि 2017 में पहला पेमेंट 110 डॉलर (करीब 8 हजार रुपए) का आया था। जब पहली बार पैसे आए तो बहुत मोटिवेशन मिला। फिर सोच लिया था कि इससे ही कमाई करना है। फिर मैं पत्नी के लंगूरों को मूंगफली खिलाते हुए वीडियो शूट करने लगा।

कभी हम लंगूरों को खिलाते थे, कभी बंदर, तो कभी गाय को खिलाते थे। मेरे घर में पत्नी के अलावा दो बच्चे हैं और दो मेरे भाई के बच्चे हैं। हम सब मिलकर वीडियो बनाने लगे और मैं उन्हें एडिट करके यूट्यूब पर अपलोड करता गया।

बद्री अपनी पत्नी मोनालिसा को कैमरे के सामने रखते हैं और खुद मोबाइल से शूट करते हैं।

अभी तक अपने चैनल पर 1100 से ज्यादा वीडियो अपलोड कर चुका हूं और सब्सक्राइबर 15 लाख 60 हजार से ज्यादा हो चुके हैं। हर महीने 60 से 70 हजार रुपए की कमाई होती है। चार सालों में 15 लाख से ज्यादा की कमाई यूट्यूब से हो चुकी है। हालांकि, इसमें 20 से 25 हजार रुपए हम जानवरों को खिलाने पर ही खर्च करते हैं। लॉकडाउन में तो 30 हजार रुपए महीने तक जीव-जंतुओं के खाने पर खर्च किए।

भविष्य में मेरा सेंक्चुरी बनाने का ही प्लान है। जिसमें जीव-जंतुओं को रखूं। उन्हें खिलाऊं-पिलाऊं। गौशाला भी खोलने की तैयारी है। जनवरी 2020 से तो मैं 17 से 18 घंटे यूट्यूब के लिए दे रहा हूं। दिन में फील्ड पर रहते हैं। नई-नई चीजें शूट करते हैं। फिर उन्हें एडिट करके यूट्यूब पर अपलोड करता हूं। पूरा काम अब भी स्मार्टफोन से ही चल रहा है, हालांकि अब जियो की जगह सैमसंग का अच्छे कैमरे वाला फोन खरीद लिया है।

यूट्यूब पर वीडियो चैनल शुरू करने और कमाई करने की चाह रखने वालों के लिए मेरी सलाह यही है कि अपना कंटेंट यूनिक रखें। ऐसा कंटेंट जिसमें कुछ सरप्राइज करने वाला हो। नया हो। लोगों को देखकर मजा आए। यदि ऐसा कंटेंट होगा तो लोग खुद ही आपके वीडियो को शेयर करेंगे और व्यूज बढ़ने लगेंगे।

अपने आसपास जो भी ऐसी चीज देखें, जो सरप्राइजिंग लगे तो उसका वीडियो बना लें और फ्री सॉफ्टवेयर की मदद से फोन से ही एडिट करके यूट्यूब पर अपलोड करते जाएं। मैं भले ही फिल्मी लाइन से रहा हूं लेकिन इस काम में किसी डायरेक्शन की जरूरत नहीं। सिर्फ कंटेंट नया होना चाहिए।

ये बद्री नारायण का परिवार है। वे कहते हैं कि चैनल के हिट होने की एक वजह ये है कि परिवार के हर सदस्य ने इसमें रोल निभाया।

क्या है यूट्यूब पर चैनल बनाने की प्रॉसेस

एक यूट्यूब चैनल की शुरुआत करने के लिए जरूरी है कि सबसे पहले आपके पास एक एक्टिव गूगल अकाउंट हो। अगर गूगल अकाउंट नहीं है, तो आप सबसे पहले गूगल अकाउंट बना लीजिए। यूट्यूब पर गूगल अकाउंट से साइन इन करने के बाद यूट्यूब चैनल बनाने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।
स्टेप- 1

यूट्यूब पर जाकर राइट साइड पर यूट्यूब अकाउंट के थंबनेल इमेज पर क्लिक करें। इसके बाद 'क्रिएट ए चैनल' विकल्प को सलेक्ट करें।

स्टेप-2

अब यूट्यूब चैनल का नाम डालें, चैनल के नाम के लिए बेहतर होगा कि आप किसी ऐसे नाम को चुनें जिससे यह स्पष्ट हो कि आपका चैनल किससे संबंधित है।

स्टेप-3

नाम सिलेक्ट करने के बाद आपको कैटेगरी सिलेक्ट करनी होगी यानी आप किस तरह का कंटेंट पोस्ट करेंगे। इसके बाद चेक बाॅक्स पर ओके का विकल्प क्लिक करना होगा। (क्लिक करने से पहले ध्यान से नियम व शर्तें पढ़ लें)

स्टेप-4

आपका यूट्यूब चैनल बन गया है। अब आप एक नए पेज पर रीडायरेक्ट हो जाएंगे, जहां आप अपने ब्रांड से जुड़ी तस्वीरें, बैकग्राउंड आर्ट, चैनल आइकन अपलोड कर सकते हैं। इसके अलावा आप अपने चैनल के बारे में मजेदार और यूनिक डिस्क्रिप्शन डाल सकते हैं।

यहां आप वो सब कुछ शेयर कर सकते हैं, जिससे ये पता चलता है कि आपका यूट्यूब चैनल किस बारे में है और आप किस तरह के कंटेट को कब पोस्ट करना चाहते हैं। इसके अलावा बिजनेस इन्क्वायरी के लिए आप ईमेल आईडी भी शेयर कर सकते हैं। इसके बाद आप अपने चैनल में वीडियो अपलोड के विकल्प को सिलेक्ट करके कोई भी वीडियो अपलोड कर सकते हैं।

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बद्री के यूट्यूब पर 15 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हो चुके हैं। उन्हें यूट्यूब से कई अवॉर्ड्स भी मिल चुके हैं।


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(प्रमोद कुमार) हम पहुंचे हैं दुनिया की एक तिहाई वैक्सीन बनाने वाले एशिया के सबसे बड़े फार्मा क्लस्टर हैदराबाद की जीनोम वैली में। जीनोम वैली यानी वो जगह, जहां फिलहाल करीब तीन बड़ी कंपनियों के एक हजार से ज्यादा वैज्ञानिक दिन-रात कोरोना के टीके पर काम कर रहे हैं।

हम यहां पहुंचे तो बातचीत में तीन बड़ी चीजें निकलकर सामने आईं। एक, दुनिया में कोरोना वैक्सीन कहीं भी ईजाद हो, लेकिन दुनिया की आधी आबादी को दी जाने वाली यानी लगभग 400 करोड़ डोज एक साल में हैदराबाद के जीनाेम वैली में बन सकती है।

कारण, दुनिया की बड़ी वैक्सीन निर्माताओं में शुमार भारत बायोटेक, बायोलॉजीकल ई और इंडियन इम्यूनोलाॅजिकल दुनिया की शीर्ष एक दर्जन कंपनियाें के साथ मिलकर रिसर्च कर रहीं हैं। केवल इन तीनों की वैक्सीन बनाने की सालाना क्षमता 400 करोड़ डोज है। इनमें कोई भी टीका ईजाद करे तो निर्माण यहीं होगा।

अगर टीका दूसरी कंपनियां भी ईजाद करती हैं, तब भी निर्माण यहीं होने की उम्मीद है क्योंकि यहां मौजूद अन्य कंपनियां भी शामिल कर लें तो यहां सालाना 600 करोड़ डोज बनाने की क्षमता है। दूसरी, एक तरह की वैक्सीन सभी इंसानों पर काम नहीं कर पाएगी, इसलिए ये कंपनियां 8 तरह की वैक्सीन पर काम कर रही हैं। मतलब, लक्षण देखकर हर व्यक्ति को अलग-अलग वैक्सीन दी जाएगी। तीसरी बात, वैक्सीन के लिए अभी कम से कम 8 महीने और इंतजार करना होगा। ये अप्रैल 2021 से पहले नहीं आ पाएगी।

हम सबसे पहले पहुंचे बेगमपेट स्थित तेलंगाना सरकार के लाइफ साइंस एंड फार्मा सिटी के दफ्तर। वहां लाइफ साइंस के डायरेक्टर एवं जीनोम वैली के सीईओ शक्ति नागप्पन से मुलाकात हुई। नागप्पन कहते हैं कि दुनिया की एक तिहाई वैक्सीन यहां बनती हैं। देश का अनुमानित 60 फीसदी प्रोडक्शन भी यहीं होता है। वे आगे बताते हैं कि फार्मा कंपनियों के अनुसार मार्च 2021 के बाद वैक्सीन आ सकती है।

भारत बायोटेक 3 तरह, बायोलॉजीकल ई 3 तरह और इंडियन इम्यूनॉजीकल 2 तरह की वैक्सीन बना रही हैं। सभी रिसर्च कर रहे हैं, जो सबसे बेहतर वैक्सीन हो वो सबसे पहले लाएंगे। पहले जो वैक्सीन आई हैं वो केवल एक तरह से काम करती थीं, लेकिन कोविड की हर वैक्सीन का मैकेनिज्म अलग होगा। कुछ वैक्सीन 2 महीने, कुछ एक साल का तो कुछ लाइफ टाइम काम कर सकती हैं। किसी का रिसर्च पूरा वायरस खत्म करने का है तो किसी का एक साल तक रोकने का है।

जीनोम वैली के वैज्ञानिक डॉ. प्रभुकुमार चालानी कोरोना के अलावा एंटीबॉडी पर भी रिसर्च कर रहे हैं। रिसर्च कंपनी का नाम न बताते हुए उन्होंने कहा कि काेविड वैक्सीन एक तरह की बन ही नहीं सकती, क्योंकि इसके वायरस 1300 तरह के हैं। मलेशिया में फैला एक कोविड वायरस इंसान को तत्काल मार देता है तो दूसरा वायरस अश्वेतों पर कम असर करता है। उम्र का अंतर होने पर भी असर अलग-अलग है, तो एक वैक्सीन कैसे बन सकती है।

कुछ वैज्ञानिक तो अपने घर भी नहीं जा रहे हैं

भारत बायोटेक के एक स्टाफ ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि रिसर्च एरिया में वैज्ञानिकों के अलावा अन्य किसी को आने की इजाजत नहीं है। एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया कि भारत बायोटेक के 120 वैज्ञानिक और 200 वैज्ञानिक सहयोगी (साइंटिफिक वर्कफोर्स) राेज तकरीबन 18-18 घंटे काम कर रहे हैं।

बायोलॉजिकल ई के एक स्टाफ ने बताया कि एक और शिफ्ट शुरू हो गई है। पहले तो 5-10 लोग ही रुकते थे। अब 300 वैज्ञानिक रुकते हैं। कई बार 100-100 पैकेट खाना भी बाहर से पैक होकर आता है। यहां के बाद हम इंडियन इम्यूनाेलॉजिकल के प्लांट पहुंचे।

वहां एक अधिकारी ने बताया कि हमारा फर्स्ट फेज का ह्यूमन ट्रायल शुरू हो गया है। हमारी कोशिश है कि सेकंड फेस का ट्रायल पूरा करने के बाद वैक्सीन बनाना शुरू कर दें। तीसरे ट्रायल की जरूरत न रहे, इसके लिए आवश्यक जरूरी नियमों के अनुसार हम कदम उठा रहे हैं।

हमारे 180 वैज्ञानिक और उनके 150 सहयोगी सुबह 8 से लेकर शाम 7 बजे तक रिसर्च कर रहे हैं। हमारे करीब 15 वैज्ञानिक तो घर भी नहीं जाते हैं। हम कोशिश कर रहे हैं कि जल्द से जल्द दुनिया को कोरोना का टीका मिल जाए।

4 लाख नौकरियां आएंगी यहां

  • 18 देशों की 200 कंपनियां जीनोम वैली में रिसर्च करती हैं। इस फार्मा कलस्टर में 15 हजार साइंटिस्ट रिसर्च करते हैं।
  • 600 करोड़ वैक्सीन डोज सालान बनाने की क्षमता है। इसे सिटी ऑफ वैक्सीन कहा जाता है।
  • 14 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा राजस्व प्राप्त होता है जीनोम वैली से सरकार को।
  • 4 लाख नई नौकरियां आएंगी यहां अगले 10 सालों में, 100 अरब डॉलर का उद्योग पनपेगा। वैली की स्थापना वर्ष 1999 में हुई थी।


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हैदराबाद की इस वैली में प्रदूषण फैलाने वाली गोली-कैप्सूल बनाने की अनुमति नहीं देते हैं। इसलिए जीनोम वैली को ग्रीन और क्लीन वैली भी कहा जाता है।


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(विनोद यादव) ‘मैं सुबह 9 बजे दुकान पर आया हूं। शाम के 7 बज गए हैं। एक भी ग्राहक नहीं आया। धारावी से लेदर सहित अन्य सामानों का एक्सपोर्ट तो लगभग ठप्प हो गया है।’ यह कहना है कि धारावी लेदर गुड्स मैन्युफैक्चरिंग एसोसिशन के वर्किंग प्रेसिडेंट राजेश सोनावणे का।

सोनावणे बताते हैं कि कोरोना की वजह से धारावी की हुई बदनामी के कारण यहां अब भी ग्राहक नहीं आ रहे हैं। जिसकी वजह से जिन लोगों ने किराए पर दुकानें ले रखी थीं। उसमें से 50 फीसदी लोगों ने दुकान ही खाली कर दी है। मार्केट में मांग नहीं होने की वजह से दुकानदार किराया तक नहीं दे पा रहे हैं।

हब ऑफ इंटरनेशनल एक्सपोर्ट कहे जाने वाले धारावी में कोरोना के कारण लोग आने में घबराने लगे हैं

यहां इन्क्वायरी भी सिर्फ फार्मास्युटिकल कंपनी और थोड़ी बहुत गिफ्ट के सामानों की आ रही है। हब ऑफ इंटरनेशनल एक्सपोर्ट कहे जाने वाले धारावी में कोरोना के कारण लोग आने में घबराने लगे हैं। इस इलाके में अब तक 2700 से ज्यादा कोरोना के मरीज मिले हैं, हालांकि एक्टिव केस अब 100 से भी कम है। बावजूद इसके इस इलाके में ग्राहक आने से घबरा रहे हैं।

यहां का कुंभारवाड़ा मिट्‌टी के सामान बनाने के लिए पूरी मुंबई में मशहूर है। यहां के प्रजापति सहकारी उत्पादक संघ के अध्यक्ष कमलेश चित्रोडा ने बताया कि नवरात्रि से दीपावली तक हमारे दो लाख दीये बिकते थे। अभी इस बार उतने दीए नहीं बने हैं। कोरोना की वजह से मजदूरों की भारी कमी है।

गोडाउन में मजदूर सोशल डिस्टेंसिंग के कारण इकट्‌ठा नहीं हो पा रहे हैं। उन्हें स्वास्थ्य के साथ जुर्माने का भी डर है। चित्रोड़ा के अनुसार धारावी में मिट्‌टी के दिए बनाने का काम कम से कम दो-तीन महीने पहले शुरू होता था। लेकिन, हम इस बार करीब 50 फीसदी दीये ही बना पाएंगे।

तो इस बार मुंबई में दिवाली के मौके पर दीयों की किल्लत हो सकती है

वे बताते हैं कि लॉकडाउन की वजह से पर्याप्त मात्रा में मिट्‌टी भी नहीं आ पाई। चित्रोड़ा का अनुमान है कि यदि यदि बाजार में डिमांड सुस्त रहती है, तो इस बार मुंबई में दिवाली के मौके पर दीयों की किल्लत होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। धारावी के ही कामराज नगर लेदर शॉप एसोसिएशन के प्रेसिडेंट चंद्रकांत पोटे बताते हैं कि हमारे यहां बिकने वाले ज्यादातर आइटम नॉन एसेंशियल हैं।

लिहाजा हमारा धंधा मंदा चल रहा है। वे भी सोनावणे की इस बात से इक्तेफाक रखते हैं कि धारावी में कोरोना मरीजों की संख्या बड़े पैमाने पर बढ़ने की खबर से यहां के उद्योग-धंधों को बहुत नुकसान हुआ है।

क्यों महत्व्पूर्ण है ये इलाका : मुंबई मनपा के जिस जी-उत्तर वार्ड के अंतर्गत धारावी का इलाका आता है। उसके सहायक मनपा आयुक्त किरण दिघावकर बताते हैं कि 2.5 वर्ग किमी में फैली धारावी में 5 हजार जीएसटी रजिस्टर्ड इंटरप्राइजेज हैं। इसके अलावा 15 हजार एक कमरे वाली फैक्टरियां हैं।

धारावी इलाके का सालाना टर्नओवर करीब 7 हजार करोड़ रुपए है। जिसकी वजह से धारावी को “हब ऑफ इंटरनेशनल एक्सपोर्ट” भी कहा जाता है। मगर अब धारावी की लेदर इंडस्ट्रीज हो, प्लास्टिक रीसाइक्लिंग इंडस्ट्रीज हो, गार्मेंट फैक्टरी हो या फिर मेटल इंडस्ट्रीज सभी की हालत खस्ता है।



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कोरोना के चलते धारावी इलाके में मजदूरों की भी कमी हो गई है। (फाइल फोटो)


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रोबोट का चलन काफी तेज होता जा रहा है। पहले दुनियाभर के होटल, मॉल, दफ्तर आदि में रोबोट्स का इस्तेमाल काम में तेजी और सौंदर्य के लिए होता था, लेकिन अब इनका इस्तेमाल सुरक्षा की दृष्टि से बढ़ा है।खासतौर पर सफाई वाले रोबोट्स की डिमांड पिछले कुछ समय में काफी बढ़ गई है।
कनाडा की कंपनी एवीबोट्स के मुताबिक फ्लोर क्लीनिंग रोबोट्स की बिक्री कोरोना के बाद दोगुनी बढ़ गई है। जो पहले इसके बारे में जानना भी नहीं चाहते थे वे भी इसे खरीद रहे हैं। अमेरिकी कंपनी ब्रेन कॉर्प्स ने कहा कि उसके सेल्फ ड्राइविंग क्लीनिंग रोबोट्स की बिक्री पिछले वर्ष के मुकाबले इस अप्रैल में 24 फीसदी बढ़ गई है।

ब्रेन कॉर्प के सीईओ यूजीन इज्हीकेविच बताते हैं कि वॉलमार्ट जैसे स्टोर्स से कोरोना के बाद क्लीनिंग रोबोट्स के ऑर्डर बढ़ गए हैं। वे चाहते हैं कि हम जल्द से जल्द इन्हें लगवा दें। इन क्लीनिंग रोबोट्स की कीमत 40 हजार डॉलर से 60 हजार डॉलर तक है। इनके सॉफ्टवेयर का खर्चा भी अलग से है।

देश में भी इस वर्ष 30 गुना बढ़ जाएगा बाजार

देश में रोबोट बनानी वाली प्रमुखा कंपनी मिलाग्रो की बिक्री इस वर्ष 15 से 20 गुना बढ़ने की उम्मीद है। कंपनी के अनुसार इस वर्ष देश में रोबोट का बाजार करीब 30 गुना बढ़ जाएगा। इसका कारण है कि लोग अब रोबोट पर भरोसा करने लगे हैं।

आगे और बेहतर बना रहे

अमेरिका की कार्नेगी रोबोटिक्स कंपनी अपने प्रसिद्ध फ्लोर क्लीनर रोबोट निलफिस्क लिबर्टी में बड़े पैमाने पर एक ऐसा अटैचमेंट टेस्ट कर रही है जो कोरोना वायरस को भी अल्ट्रावॉयलेट लाइट से खत्म कर देगी। पिट्सबर्ग एयरपोर्ट में ऐसा रोबोट लग गया है।

1987 में बना था पहला कॉमर्शियल रोबोट

बात 1987 की है, जब रोबोकेंट नाम का दुनिया का पहला कमर्शियल फ्लोर क्लीनिंग रोबोट बना था। इसे अमेरिकी कंपनी ने बनाया था।

सफाई के अलावा यहां भी हो रहे इस्तेमाल

  • अस्पताल में- डेनमार्क की कंपनी यूपीडी रोबोट्स ने अप्रैल माह में ही चीन और यूरोप के अस्पतालों में सैकड़ों रोबोट भेजे हैं।
  • रेस्टोरेंट में- अमेरिकी फास्ट फूड कंपनी मैकडोनल्ड्स कुकिंग और सर्विंग के लिए रोबोट्स को टेस्ट कर रही है।
  • फैक्ट्रियों में- अमेरिकी कार कंपनी फोर्ड ने हाल ही में अपने एक प्लांट में फ्लफी नाम का रोबोट तैनात किया है जो 2 लाख स्क्वायर मीटर के प्लांट से डेटा जमा करता है।

स्रोत: टाइम, फॉर्च्यून, फोर्ब्स व अन्य मीडिया रिपोर्ट्स।



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फ्लोर क्लीनिंग रोबोट्स की बिक्री कोरोना के बाद दोगुनी बढ़ गई है। जो पहले इसके बारे में जानना भी नहीं चाहते थे वे भी इसे खरीद रहे हैं।


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गुजरात में विश्व का सबसे बड़ा टॉय म्यूजियम बनने वाला है। इसके लिए 30 एकड़ जमीन आवंटित कर दी गई है। यह गुजरात की चिल्ड्रेन यूनिवर्सिटी के बाल भवन प्रोजेक्ट के तहत बनाया जा रहा है। यहां प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक के 11 लाख से ज्यादा खिलौने प्रदर्शित किए जाएंगे।

इसका उद्देश्य खिलौनों के जरिए वैज्ञानिक, कलाकार, महापुरुषों का परिचय कराना और भारतीय संस्कृति का दर्शन करवाना है। राज्य की राजधानी गांधीनगर स्थित गिफ्ट सिटी के करीब शाहपुर और रतनपुर गांव के बीच में इसे बनाने की तैयारी है।

इस बाल भवन की लागत करीब 1500 करोड़ रुपए होगी। इसे बनने में अभी करीब 5 साल का समय लगेगा। चिल्ड्रेन यूनिवर्सिटी के कुलपति हर्षदभाई शाह ने भास्कर को बताया कि अगले दो -तीन महीनों में निर्माण कार्य शुरू होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शिलान्यास के लिए आमंत्रित किया जाएगा। फिलहाल इसके लिए प्रधानमंत्री खुद सक्रिय मार्गदर्शन कर रहे हैं।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने 22 अगस्त को इसके लिए ऑनलाइन संवाद भी किया था। इसमें उन्होंने चिल्ड्रेन यूनिवर्सिटी को टॉय म्यूजियम प्रोजेक्ट से संबंधित प्रजेंटेशन प्रस्तुत करने को कहा है। मोदी ने कहा है कि चिल्ड्रेन यूनिवर्सिटी इस योजना में अपनी पूर्ण शक्ति झोंक कर काम करे।

खिलौना शास्त्र विकसित करेगी यूनिवर्सिटी, डीआरडीओ-इसरो बनाएंगे खिलौनों के मॉडल

  • बच्चों को वैज्ञानिकों, कलाकारों, महापुरुषों का परिचय और भारतीय संस्कृति का दर्शन करवाया जाएगा।
  • गगन यान, मिसाइलों, ईवीएम मशीन, 1875 की क्रांति आदि की कहानी, झांकी खिलौनों के माध्यम से बताई जाएगी।
  • गुजराती, हिंदी, अंग्रेजी सहित कई भारतीय भाषाओं में सीखने के लिए चिल्ड्रेन यूनिवर्सिटी का पाठ्यक्रम होगा।
  • डीआरडीओ, इसरो की मदद से इलेक्ट्रॉनिक, बैटरी, सोलर आधारित छोटे यान, पृथ्वी-अग्नि मिसाइल, सैटेलाइट आदि के मॉडल खिलौने तैयार किए जाएंगे।
  • बाल मन को शिक्षा-संस्कार देने के विचार को ध्यान में रखते हुए चिल्ड्रेन यूनिवर्सिटी खिलौना शास्त्र विकसित करेगी।


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अभी सबसे बड़ा टॉय म्यूजियम अमरीका के मिसौरी स्टेट में है। यहां प्राचीन से आधुनिक समय के 10 लाख से अधिक खिलौने हैं।


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गुजरात में विश्व का सबसे बड़ा टॉय म्यूजियम बनने वाला है। इसके लिए 30 एकड़ जमीन आवंटित कर दी गई है। यह गुजरात की चिल्ड्रेन यूनिवर्सिटी के बाल भवन प्रोजेक्ट के तहत बनाया जा रहा है। यहां प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक के 11 लाख से ज्यादा खिलौने प्रदर्शित किए जाएंगे।

इसका उद्देश्य खिलौनों के जरिए वैज्ञानिक, कलाकार, महापुरुषों का परिचय कराना और भारतीय संस्कृति का दर्शन करवाना है। राज्य की राजधानी गांधीनगर स्थित गिफ्ट सिटी के करीब शाहपुर और रतनपुर गांव के बीच में इसे बनाने की तैयारी है।

इस बाल भवन की लागत करीब 1500 करोड़ रुपए होगी। इसे बनने में अभी करीब 5 साल का समय लगेगा। चिल्ड्रेन यूनिवर्सिटी के कुलपति हर्षदभाई शाह ने भास्कर को बताया कि अगले दो -तीन महीनों में निर्माण कार्य शुरू होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शिलान्यास के लिए आमंत्रित किया जाएगा। फिलहाल इसके लिए प्रधानमंत्री खुद सक्रिय मार्गदर्शन कर रहे हैं।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने 22 अगस्त को इसके लिए ऑनलाइन संवाद भी किया था। इसमें उन्होंने चिल्ड्रेन यूनिवर्सिटी को टॉय म्यूजियम प्रोजेक्ट से संबंधित प्रजेंटेशन प्रस्तुत करने को कहा है। मोदी ने कहा है कि चिल्ड्रेन यूनिवर्सिटी इस योजना में अपनी पूर्ण शक्ति झोंक कर काम करे।

खिलौना शास्त्र विकसित करेगी यूनिवर्सिटी, डीआरडीओ-इसरो बनाएंगे खिलौनों के मॉडल

  • बच्चों को वैज्ञानिकों, कलाकारों, महापुरुषों का परिचय और भारतीय संस्कृति का दर्शन करवाया जाएगा।
  • गगन यान, मिसाइलों, ईवीएम मशीन, 1875 की क्रांति आदि की कहानी, झांकी खिलौनों के माध्यम से बताई जाएगी।
  • गुजराती, हिंदी, अंग्रेजी सहित कई भारतीय भाषाओं में सीखने के लिए चिल्ड्रेन यूनिवर्सिटी का पाठ्यक्रम होगा।
  • डीआरडीओ, इसरो की मदद से इलेक्ट्रॉनिक, बैटरी, सोलर आधारित छोटे यान, पृथ्वी-अग्नि मिसाइल, सैटेलाइट आदि के मॉडल खिलौने तैयार किए जाएंगे।
  • बाल मन को शिक्षा-संस्कार देने के विचार को ध्यान में रखते हुए चिल्ड्रेन यूनिवर्सिटी खिलौना शास्त्र विकसित करेगी।


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(विनोद यादव) ‘मैं सुबह 9 बजे दुकान पर आया हूं। शाम के 7 बज गए हैं। एक भी ग्राहक नहीं आया। धारावी से लेदर सहित अन्य सामानों का एक्सपोर्ट तो लगभग ठप्प हो गया है।’ यह कहना है कि धारावी लेदर गुड्स मैन्युफैक्चरिंग एसोसिशन के वर्किंग प्रेसिडेंट राजेश सोनावणे का।

सोनावणे बताते हैं कि कोरोना की वजह से धारावी की हुई बदनामी के कारण यहां अब भी ग्राहक नहीं आ रहे हैं। जिसकी वजह से जिन लोगों ने किराए पर दुकानें ले रखी थीं। उसमें से 50 फीसदी लोगों ने दुकान ही खाली कर दी है। मार्केट में मांग नहीं होने की वजह से दुकानदार किराया तक नहीं दे पा रहे हैं।

हब ऑफ इंटरनेशनल एक्सपोर्ट कहे जाने वाले धारावी में कोरोना के कारण लोग आने में घबराने लगे हैं

यहां इन्क्वायरी भी सिर्फ फार्मास्युटिकल कंपनी और थोड़ी बहुत गिफ्ट के सामानों की आ रही है। हब ऑफ इंटरनेशनल एक्सपोर्ट कहे जाने वाले धारावी में कोरोना के कारण लोग आने में घबराने लगे हैं। इस इलाके में अब तक 2700 से ज्यादा कोरोना के मरीज मिले हैं, हालांकि एक्टिव केस अब 100 से भी कम है। बावजूद इसके इस इलाके में ग्राहक आने से घबरा रहे हैं।

यहां का कुंभारवाड़ा मिट्‌टी के सामान बनाने के लिए पूरी मुंबई में मशहूर है। यहां के प्रजापति सहकारी उत्पादक संघ के अध्यक्ष कमलेश चित्रोडा ने बताया कि नवरात्रि से दीपावली तक हमारे दो लाख दीये बिकते थे। अभी इस बार उतने दीए नहीं बने हैं। कोरोना की वजह से मजदूरों की भारी कमी है।

गोडाउन में मजदूर सोशल डिस्टेंसिंग के कारण इकट्‌ठा नहीं हो पा रहे हैं। उन्हें स्वास्थ्य के साथ जुर्माने का भी डर है। चित्रोड़ा के अनुसार धारावी में मिट्‌टी के दिए बनाने का काम कम से कम दो-तीन महीने पहले शुरू होता था। लेकिन, हम इस बार करीब 50 फीसदी दीये ही बना पाएंगे।

तो इस बार मुंबई में दिवाली के मौके पर दीयों की किल्लत हो सकती है

वे बताते हैं कि लॉकडाउन की वजह से पर्याप्त मात्रा में मिट्‌टी भी नहीं आ पाई। चित्रोड़ा का अनुमान है कि यदि यदि बाजार में डिमांड सुस्त रहती है, तो इस बार मुंबई में दिवाली के मौके पर दीयों की किल्लत होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। धारावी के ही कामराज नगर लेदर शॉप एसोसिएशन के प्रेसिडेंट चंद्रकांत पोटे बताते हैं कि हमारे यहां बिकने वाले ज्यादातर आइटम नॉन एसेंशियल हैं।

लिहाजा हमारा धंधा मंदा चल रहा है। वे भी सोनावणे की इस बात से इक्तेफाक रखते हैं कि धारावी में कोरोना मरीजों की संख्या बड़े पैमाने पर बढ़ने की खबर से यहां के उद्योग-धंधों को बहुत नुकसान हुआ है।

क्यों महत्व्पूर्ण है ये इलाका : मुंबई मनपा के जिस जी-उत्तर वार्ड के अंतर्गत धारावी का इलाका आता है। उसके सहायक मनपा आयुक्त किरण दिघावकर बताते हैं कि 2.5 वर्ग किमी में फैली धारावी में 5 हजार जीएसटी रजिस्टर्ड इंटरप्राइजेज हैं। इसके अलावा 15 हजार एक कमरे वाली फैक्टरियां हैं।

धारावी इलाके का सालाना टर्नओवर करीब 7 हजार करोड़ रुपए है। जिसकी वजह से धारावी को “हब ऑफ इंटरनेशनल एक्सपोर्ट” भी कहा जाता है। मगर अब धारावी की लेदर इंडस्ट्रीज हो, प्लास्टिक रीसाइक्लिंग इंडस्ट्रीज हो, गार्मेंट फैक्टरी हो या फिर मेटल इंडस्ट्रीज सभी की हालत खस्ता है।



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कोरोना के चलते धारावी इलाके में मजदूरों की भी कमी हो गई है। (फाइल फोटो)


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