(मनीषा भल्ला). यह उदय कृष्ण पेड्डीरेड्डी का पेड़ों से इश्क है कि वह पेड़ों को बिना काटे, कत्ल किए एक जगह से दूसरी जगह पर लगा देते हैं। पेड़ कितना ही बड़ा या पुराना क्यों न हो। वट फाउंडेशन के तहत पेड्डीरेड्डी ने वर्ष 2010 में यह काम शुरू किया था और आज तक वह करीब 2200 तक पेड़ों को बचा चुके हैं।
भास्कर से बातचीत में उदय कृष्ण पेड्डीरेड्डी बताते हैं, ‘मैं एक कॉन्ट्रेक्टर हूं, 2010 में हैदराबाद में एक फुटओवर ब्रिज बना रहा था, जिसमें 16 पेड़ काटे जाने जरूरी थे। मैंने तय कर लिया था कि पेड़ नहीं काटूंगा। मैंने एक प्रयोग किया कि जेसीबी की मदद से बड़े-बड़े 20-20 साल पुराने पेड़ों को एक जगह से दूसरी जगह रीलोकेट किया, इन 16 में से 13 पेड़ बच गए थे, वहीं से पेड़ रिलोकेट करने का सिलसिला शुरू हुआ।’
अब वट को पेड़ रिलोकेट करने के लिए दूसरे राज्यों से भी फोन आने लगे हैं।
पेड्डीरेड्डी के अनुसार, उनकी संस्था केवल सरकारी प्रोजेक्ट्स के तहत आने वाले पेड़ों को ही बचाती है। वह बताते हैं कि सरकार बिल्कुल भी पेड़ बचाना नहीं चाहती है। सरकारी प्रोजेक्ट्स में आने वाले पेड़ों को बचाने के लिए वट (संस्था) तीन बार अदालत भी जा चुकी है। अब वट को पेड़ रिलोकेट करने के लिए दूसरे राज्यों से भी फोन आने लगे हैं।
(कुलदीप सिंगोरिया) अर्थव्यवस्था जितनी नीचे आनी थी, वह आ चुकी है। अब यह ऊपर की ओर ही जाएगी। लॉकडाउन और अनलॉक को ही देखिए। हर अनलॉक में स्थिति बेहतर हो रही है। हमारे यहां खुद की बहुत बड़ी घरेलू डिमांड है। ये डिमांड अर्थव्यवस्था को सामान्य हाालत में लौटाने के लिए पर्याप्त है। उद्योग संगठन एसोचैम और रियल एस्टेट डेवलपर्स के संगठन नारडेको के राष्ट्रीय अध्यक्ष निरंजन हीरानंदानी ने दैनिक भास्कर से इंटरव्यू में ये बात कही।
हीरानंदानी ने कहा कि कोरोना की वजह से चीन के खिलाफ दुनिया में नकारात्मक भावना की एक लहर है। जाहिर है, कई मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां चीन से हटेंगी। वहां हाल ही में कई फैक्ट्रियां बंद हुई हैं। इनमें से ज्यादातर वियतनाम में स्थानांतरित हुईं और कुछ बांग्लादेश भी चली गईं।
अब भारत को ऐसी उत्पादन इकाइयों को आकर्षित करने के लिए ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बेहतर बनाना होगा। नीतिगत फैसलों और कार्यान्वयन में तेजी लानी होगी। उन्होंने कहा कि इस बीच केंद्र सरकार की ओर से शुरू की गई पीएलआई योजना से निश्चित रूप से मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा।
कोरोना काल ने हर सेक्टर को कुछ सिखाया: निरंजन हीरानंदानी
सवाल: कोरोनावायरस से उद्योगों ने क्या सबक लिया है?
सबसे बड़ा सबक यह है कि सब कुछ बदलने में महज एक मिनट लगता है। और हमेशा से यह होता आया है। परिवर्तन सबसे स्थायी कारक है। अब बस हमें किसी भी बदली हुई परिस्थितियों के अनुकूल होने की जरूरत है। मतलब कि अब कोरोनावायरस के हिसाब से ही हमें अपनी जिंदगी व बिजनेस को ढाल लेना चाहिए।
सवाल: रियल एस्टेट पर कोरोना का क्या असर रहा है?
रियल एस्टेट इंडस्ट्री की बात करें तो नया बदलाव बेहद अहम है। अब वर्क फ्रॉम होम कल्चर की वजह से लोगों के लिए घर बेहद जरूरी है। इसलिए, घर में सबसे बड़ा निवेश होगा। रियल एस्टेट सेक्टर में इन सभी फैक्टर्स को शामिल करना होगा। हमें यह देखना होगा कि कोरोना के हिसाब से घर के लिए नए मानदंड क्या होंगे? घर से सारे काम करने के लिए घर में किन चीजों को आवश्यकता होगी? डिजाइन कैसी हाेनी चाहिए?
सवाल: रियल एस्टेट सेक्टर के सामने और क्या चुनौतियां हैं?
रियल एस्टेट सेक्टर के लिए 2019 सकारात्मक रहा था, और हमें उम्मीद थी कि 2020 ग्रोथ का वर्ष होगा। लेकिन लॉकडाउन ने प्रभावित किया। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अधूरे प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए नकदी मिले। वन टाइम लोन रोलओवर जैसे कदम की सख्त जरूरत है। सरकार को यह समझना चाहिए कि रियल एस्टेट से 250 से अधिक सहायक उद्योग जुड़े हैं।
from Dainik Bhaskar /national/news/bhaskar-interview-assocham-and-nardeko-national-president-niranjan-hiranandani-are-saying-that-the-worst-time-has-passed-only-domestic-demand-is-enough-to-improve-the-economy-127692777.html
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यह कहानी जयपुर के रहने वाले दो दोस्तों गौरव मुंजाल और रोमन सैनी की है। दूसरों की जिंदगी गढ़ने की इनकी जिद और जुनून ने 5 साल पहले शुरू की गई इनकी कंपनी अनएकेडमी को देश की 200 कंपनियों के क्लब में शामिल करवा दिया। अनएकेडमी आज ऑनलाइन एजुकेशन के प्लेटफार्म पर दुनिया की छठे पायदान पर है। कंपनी की वर्तमान वैल्यूएशन 11 हजार करोड़ (1.45 बिलियन डॉलर) है।
कंपनी की शुरुआत करने वाले गौरव मुंजाल ने कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में बीटेक करने के बाद लाखों के पैकेज की नौकरी छोड़ी। उनके पिता डॉ. ईश मुंजाल शहर के प्रख्यात डॉक्टर हैं। वहीं, रोमन सैनी ने आईएएस की सेवा में चयनित होने के 6 महीने बाद ही इस्तीफा दे दिया।
गौरव मुंजाल ने यू-ट्यूब पर काॅलेज के दौरान इसकी शुरुआत की
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने देशभर के स्टार्टअप को बुलाया और उसमें से गौरव और रोमन भी एक थे। गौरव मुंजाल ने यू-ट्यूब पर काॅलेज के दौरान इसकी शुरुआत की। फिर अपने दोस्त आईएएस रोमन सैनी को 2015 में इसे आगे बढ़ाने के लिए साथ आने को कहा। रोमन ने नौकरी छोड़ी और गौरव के साथ आ गए।
35 प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी 18 हजार एजुकेटर कराते हैं
यू-ट्यूब और ऐप पर अनएकेडमी सबसे ज्यादा देखा जाता है। 35 प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी 18 हजार एजुकेटर कराते हैं। अनएकेडमी वाईफाई, प्रेप लेडर, कोड शेफ, मास्टरी जैसी कंपनी एक्वॉयर कर चुकी है। यही नहीं सॉफ्ट बैंक, सिकोवा, फेसबुक, जनरल एटलांटा आदि कंपनियों ने अनएकेडमी में पैसा लगाया। अनएकेडमी के 3.5 लाख से ज्यादा सबस्क्राइबर हैं। अनएकेडमी आईपीएल की भी ऑफिशियल पार्टनर है।
11वीं में गौरव स्कूल टीम में शामिल नहीं हो पाया तो मैगजीन का ई एक्स-रे बना दिया था: डॉ. ईश
गौरव के पैरेंट्स सीमा मुंजाल और डॉ. ईश मुंजाल गौरव के खुद पर भरोसे का किस्सा बताते हैं- गौरव की पढ़ाई लिखाई सेंट जैवियर्स से हुई है। 11वीं में गौरव को स्कूल मैग्जीन टीम में शामिल नहीं किया गया। उसने प्रिंसिपल से बात की लेकिन बात बनी नहीं। इस पर गौरव ने मैगजीन का ऑनलाइन कर ई एक्स-रे बना डाला।
मां सीमा मुंजाल बताती हैं कि असफलता की बात पर गौरव सिर्फ मुस्कुरा देता था। वहीं, रोमन के पैरेंट्स अनीता और राम अवतार सैनी बताते हैं कि रोमन ने 12वीं के बाद एम्स से एमबीबीएस की फिर आईएएस बना। नौकरी छोड़ गौरव के साथ उसने अनएकेडमी शुरू की।
from Dainik Bhaskar /local/rajasthan/news/two-friends-of-jaipur-started-unaccounted-company-of-rs11000-crore-5-years-ago-number-six-in-online-education-in-the-world-127693914.html
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(मनीषा भल्ला). यह उदय कृष्ण पेड्डीरेड्डी का पेड़ों से इश्क है कि वह पेड़ों को बिना काटे, कत्ल किए एक जगह से दूसरी जगह पर लगा देते हैं। पेड़ कितना ही बड़ा या पुराना क्यों न हो। वट फाउंडेशन के तहत पेड्डीरेड्डी ने वर्ष 2010 में यह काम शुरू किया था और आज तक वह करीब 2200 तक पेड़ों को बचा चुके हैं।
भास्कर से बातचीत में उदय कृष्ण पेड्डीरेड्डी बताते हैं, ‘मैं एक कॉन्ट्रेक्टर हूं, 2010 में हैदराबाद में एक फुटओवर ब्रिज बना रहा था, जिसमें 16 पेड़ काटे जाने जरूरी थे। मैंने तय कर लिया था कि पेड़ नहीं काटूंगा। मैंने एक प्रयोग किया कि जेसीबी की मदद से बड़े-बड़े 20-20 साल पुराने पेड़ों को एक जगह से दूसरी जगह रीलोकेट किया, इन 16 में से 13 पेड़ बच गए थे, वहीं से पेड़ रिलोकेट करने का सिलसिला शुरू हुआ।’
अब वट को पेड़ रिलोकेट करने के लिए दूसरे राज्यों से भी फोन आने लगे हैं।
पेड्डीरेड्डी के अनुसार, उनकी संस्था केवल सरकारी प्रोजेक्ट्स के तहत आने वाले पेड़ों को ही बचाती है। वह बताते हैं कि सरकार बिल्कुल भी पेड़ बचाना नहीं चाहती है। सरकारी प्रोजेक्ट्स में आने वाले पेड़ों को बचाने के लिए वट (संस्था) तीन बार अदालत भी जा चुकी है। अब वट को पेड़ रिलोकेट करने के लिए दूसरे राज्यों से भी फोन आने लगे हैं।
(अनिरुद्ध शर्मा). कोरोना काल में दुनिया के तमाम देशों में सालों बाद बिल्कुल साफ और नीला आसमान दिखाई दिया। लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में पंजाब और उत्तर प्रदेश में इमारतों की छतों से हिमालय की चोटियां नजर आने लगीं। सड़कों पर वाहनों के आवागमन और औद्योगिक गतिविधियों के कम होने के कारण ऐसा हुआ।
दुनिया के तमाम देशों में कारों की जगह लोगों ने साइकिल पर चलना शुरू कर दिया। इसे लेकर यूनाइटेड नेशंस (यूएन) ने पहली बार 7 सितंबर को ‘इंटरनेशनल क्लीन एयर डे फॉर ब्लू स्काई’ मनाने की घोषणा की है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस इस विशेष दिवस पर सोमवार को एक वीडियो संदेश जारी करेंगे।
इसमें वे वायु प्रदूषण रोकने के लिए पर्यावरण मानकों, नीतियों और कानूनों को लागू करने, जीवाश्म ईंधनों पर सब्सिडी खत्म करने, क्लीन एनर्जी के लिए इंटरनेशनल सहयोग और विकासशील देशों से जीवाश्म ईंधन आधारित परियोजनाओं को क्लीन एनर्जी में स्थानांतरित करने पर जोर देने का आग्रह करेंगे।
भारत वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला देश है
इंटरनेशनल फोरम फॉर एन्वायर्नमेंट, सस्टनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी (आई-फॉरेस्ट) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी चंद्रभूषण बताते हैं- ‘क्लीन एयर-डे का महत्व भारत के लिए सबसे ज्यादा है। भारत वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला देश है। आंकड़े बताते हैं कि देश में आज 90 करोड़ टन कोयला, 40 करोड़ टन बायोमास, 20 करोड़ टन तेल और 5 करोड़ टन गैस की ऊर्जा के लिए खपत है।
यानी आज 80-85% ऊर्जा कोयला और बायोमास से मिलती है। यही वायु प्रदूषण के सबसे बड़े कारक हैं। देश में प्रदूषण कम करने के लिए ऊर्जा के तरीकों को बदलना होगा। कोयला और बायोमास को बदलना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। भारत को ई-व्हीकल की ओर तेजी से बढ़ना चाहिए।
दुनिया की 92%आबादी प्रदूषित हवा में सांस लेती है; फसलों पर भी असर
दुनिया की 92 फीसदी आबादी प्रदूषित हवा में सांस लेती है। इसके चलते सालाना 70 लाख लोग समय से पहले मर जाते हैं।
खुले में प्रदूषण से दुनिया में लोगों की सेहत को लेकर जितना नुकसान होता है, यूनाइटेड नेशंस के अनुमान के मुताबिक, वह ग्लोबल जीडीपी के 4.8 फीसदी (570 अरब अमेरिकी डॉलर) के बराबर है।
ओजोन के प्रदूषण का फसलों पर असर पड़ता है। सोयाबीन फसल की उपज में ओजोन प्रदूषण के चलते 15% तक की गिरावट आ जाती है।
प्रदूषण के चलते क्लाइमेट चेंज की गति तेज हुई है। मौसम के एक्सट्रीम इवेंट (जैसे किसी एक स्थान पर बहुत ज्यादा बारिश, बड़े इलाकों में बारबार सूखा, बाढ़) बढ़ गए हैं।
from Dainik Bhaskar /national/news/international-clean-air-day-for-blue-sky-will-be-celebrated-for-the-first-time-today-expert-said-its-importance-more-for-india-127693913.html
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(केए शाजी) केरल के कोट्टयम जिले का वाईकॉम महादेव मंदिर दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में अपनी सदियों पुरानी अन्नदान की परंपरा अभी तक चली आ रही है। यहां भक्त हर रोज भूखे लोगों को भोजन कराते हैं। मंदिर की रसोई में हर रोज सुबह-शाम 2000 से ज्यादा लोगों के लिए भोजन तैयार किया जाता है। लोगों को भोजन कराने का सिलसिला देर शाम तक चलता है।
मंदिर के मुख्य द्वार को बंद करने से पहले, हाथ में मशाल थामे मंदिर के सेवादार सभी चारों गेट पर खड़े होकर आवाज लगाते हैं- क्या कोई है, जो रात के खाने के लिए भूखा है। यदि कोई व्यक्ति कहता है कि हां मैं भूखा हूं, तो उसे भोजन कराने के बाद ही मंदिर के गेट बंद किए जाते हैं। मंदिर के पुजारी सुरेश पोट्टी कहते हैं कि यह ऐसा मंदिर है जहां लोगों को सुबह और शाम दोनों टाइम का भोजन कराया जाता है।.
इस लॉकडाउन में भी जरूरतमंदों को भोजन कराया गया
आज तक मंदिर में कभी यह परम्परा नहीं टूटी है। यहां तक कि इस लॉकडाउन में भी जरूरतमंदों को भोजन कराया गया। यहां शिव को वैक्कथप्पन और अन्नदाना प्रभु नाम से पुकारा जाता है। केरल के कुछ अन्य मंदिर भी दोपहर और रात के खाने में भूखे लोगों को खाना खिला रहे हैं और उनमें तिरुवनंतपुरम का प्रसिद्ध पद्मनाभ स्वामी मंदिर भी शामिल है।
108 परिवार पीढ़ियों से संभालते आ रहे हैं मंदिर की व्यवस्था
पीढ़ी दर पीढ़ी मुत्तास नामपूथिरी परिवार भोजन बना रहा है। ये पारंपरिक रूप से सुबह स्नान करते हैं। फिर पारंपरिक अग्नि कुंड से लिए जलते कोयले से शिव की पूजा करते हैं। इस रस्म के बाद ही उनकी रसोई का काम शुरू होता है। बड़े किचन में बड़ी मात्रा में विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं।
त्योहारों के समय लोगों को खिलाने के लिए रोज 3600 किलो चावल पकता है। सब्जियों को काटने का अधिकार पाथिनारनमार के रूप में पहचाने जाने वाले 16 नायर परिवारों के पास है। 108 परिवार इस मंदिर की व्यवस्था को पीढ़ी दर पीढ़ी संभाल रहे हैं।
from Dainik Bhaskar /national/news/the-doors-of-this-temple-in-kerala-are-never-closed-to-the-hungry-more-than-2000-people-eat-food-every-morning-and-evening-127693912.html
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मैं रॉबी शॉन हूं। 1999 में पेंटर बनने का सपना मुझे शेफील्ड (इंग्लैंड) के फाइन आर्ट्स कॉलेज ले गया। यहां मैंने केविंग टीम ज्वाइन की। पहले मुझे लगता था कि गुफा के अंधेरों में किसी को खुशी कैसे मिल सकती है। लेकिन, जब पहली बार पहुंचा तो अहसास हुआ कि मुझे पेंटिंग नहीं, गुफाओं की फोटोग्राफी करनी चाहिए। यहीं से मेरी यात्रा शुरू हुई।
उस वक्त न तो डिजिटल कैमरा थे और न ही गुफाओं की फोटोग्राफी का कोई बाजार। यह महंगा शौक भी था, क्योंकि एक गुफा की फोटोग्राफी में 36-36 रील खत्म हो जाते थे और अंधेरे की वजह से एक भी फोटो नहीं बनती थी। इस काम में दूसरी चुनौती यह थी कि गहरी गुफाओं में जाने और निकलने के लिए रस्सी के सहारे चढ़ना-उतरना आना चाहिए।
इन दोनों समस्याओं को सुलझाने के लिए मैंने कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में रोप-एक्सेस का काम चुना। इसमें गगनचुंबी इमारतों में रस्सी के सहारे लटककर भारी-भरकम ड्रिलिंग मशीन से घंटों काम करना पड़ता है। 12 साल तक काम और वीकेंड पर गुफाओं की फोटोग्राफी का सिलसिला चला।
इस दौरान वीकेंड पर गुफाओं की फोटोग्राफी करता। इस काम में पैसे भी अच्छे मिलते थे। इसलिए हर लिहाज से यह काम मुझे सूट करता था। यह काम इतना चुनौती भरा है कि कई बार जान तक जाते-जाते बची।
फोटो रूस के कॉकेशियन माउंटेन में स्थित दुनिया की सबसे गहरी गुफा की है।
दो साल पहले कॉकेशियन माउंटेन की सबसे गहरी गुफा की फोटो ली
दो साल पहले रूस के कॉकेशियन माउंटेन में दुनिया की सबसे गहरी गुफा (8 हजार फीट गहरी) की फोटो लेने गया था। गुफा में जाते वक्त ऐसा लग रहा था कि जैसे माउंट एवरेस्ट पर उल्टी चढ़ाई कर रहा हूं। 12 घंटे तक हम उतरते, फिर आराम करते। 12-12 घंटे के क्रम में हम 3 दिन में नीचे पहुंचे। टीम में दो रूसी एक्सपर्ट भी थे।
हमें 16 दिन तक वहां रहना था, ताकि डॉक्यूमेंट्री बना सकें। 10वें दिन अचानक हमें लगा जैसे कोई ट्रेन आ रही हो। पता चला कि बाढ़ आ गई है। जान बचाने के लिए मेमोरी कार्ड को वॉटरप्रूफ बैग में रखा और कैमरा, लाइटिंग और अन्य उपकरण छोड़कर बाहर निकले।
अब तक की यात्रा से मैं इतना ही कह सकता हूं कि अगर आपके सपने में ताकत और काम में जुनून है, तो सफलता मिलती ही है। वर्ना अधूरे मन से किया गया काम दुख भी दे सकता है।
पहले नेशनल ज्योग्राफिक के एडिटर ने सब फोटो रिजेक्ट कर दिए, बाद में उन्होंने ही बुलाया
8 साल पत्र लिखने के बाद नेशनल ज्योग्राफिक ने बुलाया, एडिटर ने सारे फोटो रिजेक्ट कर दिए, रोना आ गया...सफलता मिली तो उसी एडिटर ने वापस बुलाया। मजदूरी करते समय नेशनल ज्योग्राफिक चैनल (एनजीसी) में काम करने के लिए हजारों मेल लिखे। 8 साल बाद वॉशिंगटन डीसी आने का बुलावा आया।
एडिटर ने काम की सराहना की और कहा कि और मेहनत करो। नया पोर्टफोलियो बनाओ। एक साल बाद नए पोर्टफोलियो के साथ पहुंचा तो आंखों में आंसू भरकर बाहर निकला क्योंकि हर फोटो पर निगेटिव फीडबैक मिला।
खुशकिस्मती से 2008 में जर्मनी की एक मैग्जीन में मुझे काम मिला, जहां मैंने 4 साल तक दुनिया में घूमते हुए 3 असाइनमेंट किए। इस बीच 2012 में नेशनल ज्योग्राफिक के उसी एडिटर की तरफ से मुझे कॉल आया और तब से अब तक मैं दुनिया की कई दुर्गम गुफाओं की फोटोग्राफी कर चुका हूं।