Saturday, May 2, 2020

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आज 3 मई है। आपको पता ही होगा कि कोरोना वॉरियर्स का शुक्रिया अदा करने के लिए आर्मी बैंड आज देशभर के कोविड अस्पतालों के बाहर परफॉर्मेंस देंगे। लेकिन, क्या आपको ये पता है कि ये आर्मी बैंड्स, यानी संगीत के सैनिक बनते कहांहैं? यानी इनकी ट्रेनिंग कहां होती है? इसकी भी एक रोचक कहानी है। तो पढ़िए...

देश में संगीत के सैनिकों की ट्रेनिंग की एकमात्र जगह है पचमढ़ी। यहीं है आर्मी म्यूजिक स्कूल। 70 साल पुराना यह म्यूजिक स्कूल एशिया का सबसे बड़ा और दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मिलिट्री म्यूजिक स्कूल है। पहले नंबर पर आता है लंंदन कामिलिट्री म्यूजिक स्कूल।

अंतरराष्ट्रीय स्तर की डिजिटल म्यूजिक ट्रेनिंग के लिए पचमढ़ी में बने भारतीय सेना के मिलिट्री म्यूजिक विंग को आईएसओ सर्टिफिकेट भी मिल चुका है। 1997 में सबसे बड़े मिलिट्री बैंड के लिए इसका नाम गिनीज बुक में दर्ज हुआ था।

पचमढ़ी में 70 साल पुराना यह आर्मी म्यूजिक स्कूल एशिया में सबसे बड़ा है।

यहां देश के 51 म्यूूजिक बैंड और 10 हजार से ज्यादा म्यूजिक सोल्जर तैयार हुए हैं। यही नहीं भारत के अलावा श्रीलंका, अफगानिस्तान, माली, भूटान, म्यांमार, नेपाल जैसे 14 देशों के अफसर-जवान भी यहां म्यूजिक की ट्रेनिंग लेते हैं।

सैनिकों के लिए यहां 3 महीने से लेकर 148 हफ्तों के दस कोर्स चलाए जाते हैं। सेना के अलावा नौसेना, वायुसेना के साथ पुलिस, असम राइफल, सीआरपीएफ, बीएसएफ, पैरामिलिट्री फोर्सेसभी अपने सैनिक-अफसरों को यहां ट्रेनिंग के लिए भेजती हैं।

यहां पर श्रीलंका, अफगानिस्तान, भूटान, म्यांमार, नेपाल जैसे 14 देशों के सैनिक म्यूजिक सीखने आते हैं।

संगीत ने पहुंचाया जवान से कमिशन ऑफिसर तक
मेजर विमल जोशी सेना के म्यूजिक विंग की सबसे खूबसूरत कहानी हैं। वह बतौर जवान भर्ती हुए थे और आज कमिशन ऑफिसर हैं। यही नहीं इन दिनों वो दिल्ली स्थित आर्मी हेडक्वार्टर में डायरेक्टर ऑफ मिलिट्री बैंड हैं। बिना एसएसबी पास किए वह सिर्फ संगीत के दम पर ऑफिसर बने हैं।


वह भारतीय सेना में होने वाली सभी बैंड ट्रेनिंग कर चुके हैं। इलाहाबाद की प्रयाग संगीत समिति से संगीत प्रभाकर पास हैं। सेना बैंड के लिए कई सारी धुन और गाने कंपोज करने चुके हैं। कैप्टन जोशी दस साल के थे जब उन्होंने संगीत सीखना शुरूकिया।

देश में कोई भी ऐसा इंस्टीट्यूट नहीं जो मिलिट्री म्यूजिक बैंड के सभी इंस्ट्रूमेंट के साथ हिंदुस्तानी संगीत के यंत्र सिखाता हो। ये स्पेशलाइजेशन सिर्फ सेना के मिलिट्री म्यूजिक विंग के पास है। भारतीय मिलिट्री में वेस्टर्न म्यूजिक अंग्रेजों के समय से था, फिर 1997 में भारतीय संगीत को शामिल किया गया।

यहां मिलिट्री म्यूजिक बैंड के सभी इंस्ट्रूमेंट के साथ जवानों को हिंदुस्तानी संगीत के यंत्र भी सिखाए जाते हैं।

संगीत के साथ कॉम्बैट ट्रेनिंग भी
पचमढ़ी में म्यूजिक सीख रहे ऑफिसर-सोल्जर को फायरिंग की ट्रेनिंग भी दी जाती है। यहां आने के लिए हर जवान को म्यूजिक एप्टीट्यूड टेस्ट के साथ फिजिकल टेस्ट भी पास करना होता है। हर जवान की कैम्प सिक्योरिटी की नाइट ड्यूटी लगती है। ट्रेनिंग पूरी होने पर अपनी यूनिट में जाकर वह आम सैनिकों की तरह कॉम्बैट में हिस्सा भी लेते हैं। सीमा की रखवाली करते हैं और जरूरत पड़े तो युद्ध भी लड़ते हैं। ट्रेनिंग के दौरान हर सैनिक का दिन सुबह 4 बजे शुरूहोता है। सबसे पहले रियाज, फिर 6 बजे से पीटी और फिजिकल ट्रेनिंग। फिर 8 बजे से 10 बजे तक म्यूजिक ट्रेनिंग। उसके बाद कुछ घंटो का ब्रेक और शाम को गेम्स। फिर रात को थ्योरी क्लास। विंग में पंडित उदय भट्‌ट 21 सालों से क्लासिकल म्यूजिक सिखा रहे हैं।


युद्ध शुरू होने के लिए बजने वाला बिगुल होया युद्ध के दौरान सैनिकों में जोश भरने के लिए वीर रस का गीत। युद्ध में जीत मिलने पर गौरव गान होया शहादत के बाद श्रदांजलि। सेना के बैंड की जरूरत हर जगह होती है। संगीत सचमुच सीमाओं के पार ले जाता है। फिर चाहे वह दो देशों की सीमाएं हो। मिलिट्री के कड़े अनुशासन के बीच रैंक चाहे कोई भी हो संगीत सभी साथ सीखते हैं।

अभी तक महिलाओं को नहीं मिला मौका
अफसोस ये है कि भारतीय सेना की महिलाएं अब तक इस विंग में शामिल नहीं हुई हैं। कारण, इस विंग में केवल जवानों के स्तर पर एंट्री मिलती है। और भारतीय सेना में अब भी महिलाएं बतौर जवान भर्ती नहीं होतीं।



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पचमढ़ी के आर्मी स्कूल में देश के 51 म्यूूजिक बैंड और 10 हजार से ज्यादा म्यूजिक सोल्जर तैयार हुए हैं।


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कोरोनावायरस से जारी युद्ध में जिस शिद्दत से डॉक्टर, नर्स, पुलिसकर्मी और सफाईकर्मी जुटे हैं, उसी जुनून से बैंककर्मी भी। सोचिए यदि एटीएम जाएं और वहां पैसा न मिले तब? यहां बात उन तीन महिलाओं की हो रही है जो एटीएम में पैसा डालने वाली कंपनी एजीएस में काम करती हैं। देशभर में इस कंपनी के 12000 कर्मचारी हैं। इनमें से करीब साढ़े चार हजार कैश कस्टोडियन हैं। इन साढ़े हजार कैश कस्टोडियन में सिर्फ 3 महिलाएं हैं। कंपनी ने इन्हें सालभर के अंदर ही अपॉइंट किया है। फिलहाल इनकी ड्यूटी बर्फ के रेगिस्तान कहलाने वाले लद्दाख सेक्टर के कारगिल और जम्मू में हैं।जहां देश में सबसे ऊंचाई पर स्थित एटीएम के लिए यह काम करती हैं।

गर्भवती हैं, सर ने कहा-छुट्‌टी ले लो तो मना कर दिया

जम्मू शहर में रहने वाली बिल्किस बानों गर्भवती हैं। 6 माह पहले की कैश कस्टोडियन की नौकरी मिली। कोरोनावायरस आया तो कंपनी की तरफ से कहा गया कि, आप गर्भवती हैं, इसलिए चाहो तो छुट्‌टी ले लो। लेकिन बिल्किस ने छुट्‌टी लेने से इंकार कर दिया और प्रेग्नेंसी के आठवें महीनें में भी फील्ड पर जाकर अपना फर्ज निभा रही हैं।

बोलीं, मैं रोजाना सुबह साढ़े नौ बजे एक गनमैन, ड्राइवर और सहयोगी के साथ निकलती हूं। जो भी हमारा रूट होता है, हम उन मशीनों में कैश डालते हैं।
कोरोनावायरस आने पर मुझे कंपनी की ओर से फील्ड में जाने का मना किया गया था, लेकिन मैं नहीं मानी। मुझे लगता है कि ऐसे समय में हम जो भी सेवाएं दे सकते हैं हमे देना चाहिए। मैं पूरी सेफ्टी के साथ अपनी ड्यूटी निभा रही हूं। मुझे ये दिन हमेशा याद रहेंगे कि जब दुनिया में कोई महामारी आई थी तो हमने भी लोगों की मदद की थी।

पति की दुकान बंद, घर भी संभालती हैं और ड्य्टी का फर्ज भी

सईदा पिछले 6 माह से कैश कस्टोडियन के पद पर कंपनी में सेवाएं दे रही हैं।

33 साल की सईदा बेगम की 12 साल की बेटी है। पति की दुकान है लेकिन लॉकडाउन के चलते उनका काम धंधा बंद है। कहती हैं, मुझे कई लोगों ने बोला कि, अभी कोरोनावायरस चल रहा है, छुट्टी ले लो लेकिन मेरे लिए अपना फर्ज पहले है।
चेहरे पर मास्क, हाथों में ग्लव्ज और हैंड सैनिटाइजर लेकर हम अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। अभी तक हमने अपने इलाके के किसी भी एटीएम में कैश की कमी नहीं आने दी। हालांकि लॉकडाउन के कारण अब कैश निकल भी कम रहा है, लेकिन रोजाना फील्ड पर जाते ही हैं और जहां पैसा डालना होता है, वहां डालते हैं।
सईदा के पास इस काम का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन ट्रेनिंग ली और काम शुरू कर दिया। बोलती हैं, अब कोरोनावायरस के बीच अपनी जिम्मेदारी निभा कर गर्व की अनुभूति भी होती है। मशीनों में कैश डालने जाते हैं तो कई बार लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं, कि देखो लड़कियां भी अब यह जिम्मेदारी निभा रही हैं। यह सुनकर अच्छा लगता है।

कारगिल में दो-तीन मामले आए, लेकिन सावधानी रखकर काम में जुटीं

कारगिल में स्थित एटीएम में कैश पहुंचाने का काम करती हैं जाकिया बानो।

देश के सबसे ऊंचे इलाकों में से एक लद्दाख के कारगिल के एटीएम तक पैसे पहुंचाने का काम जाकिया बानो कर रही हैं। जाकिया 27 साल की हैं और इनके परिवार में चार बहनें और एक भाई है। बोलीं, कारगिल में एक एटीएम में कैश पहुंचाने की जिम्मेदारी मेरी है। कोरोना से डर लगता है? ये पूछने पर बोलीं, हमारे यहां दो-तीन केस आए हैं, लेकिन हम मास्क और ग्लव्ज पहनकर अपना काम कर रहे हैं।

देशभर में 60 हजार से ज्यादा एटीएम को मैनेज करने वाली एजीएस ट्रांजैक्ट टेक्नोलॉजी लिमिटेड के एचआर (ग्रुप हेड) पाथ समाई कहते हैं कि, फील्ड में काम कर रहे हमारे कर्मचारियों के लिए भी उनकी फैमिली फिक्रमंद रहती है। जितना रिस्क डॉक्टर, नर्स उठा रहे हैं, उतना ही रिस्क एटीएम तक पैसा पहुंचाने वाली टीम भी उठा रही है। खतरे के बावजूद हर कोई अपना सौ प्रतिशत दे रहाहै, इसी का नतीजा है कि एटीएम में कैश की किल्लत नहीं हो रही।



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Coronavirus In Jammu Kashmir/Kargil Lockdown Update; Meet Woman Who Deliver Money to ATM


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कोरोना के खिलाफ 54 दिन की लंबी और कठिन लड़ाई जम्मू ने जीत ली है। जम्मू जिले में कोरोना का अब एक भी केस नहीं है। 15 अप्रैल से ही जम्मू में कोरोना का कोई नया मरीज नहीं मिला है। यही नहीं जितने मरीज पॉजिटिव टेस्ट हुए थे, वह भी ठीक होकर अपने घर लौट गए हैं।


जम्मू और कश्मीर के बीच यूं तो बस एक जवाहर टनल का फासला है, लेकिन जम्मू से 250 किमी दूर कश्मीर में कोरोना अब भी चुनौती बना हुआ है। जम्मू और कश्मीर में कुल 666 केस अब तक मिले हैं, जिनमें से 606 कश्मीर डिविजन में और 60 जम्मू डिविजन में।

पॉजिटिव केस मिले 666
जम्मू डिविजन 60
कश्मीर डिविजन 606
मरीज ठीक हुए 254

कश्मीर डिविजन में 396 एक्टिव केस हैं जबकि जम्मू में एक्टिव केस सिर्फ 8 हैं। इनमें से 2 केस उधमपुर, 2 सांबा और एक-एक राजौरी, रियासी, रामबन और कठुआ में एक्टिव है।


जम्मू जिले में एक भी केस नहीं है, जबकि श्रीनगर जिले में 106 केस हैं।


कश्मीर में सबसे ज्यादा बांदीपोरा जिले में हैं जहां 128 केस मिले हैं, जबकि एक्टिव 91 हैं। इसी जिले में जिस मरीज की सबसे पहली मौत हुई थी, उसके कॉन्टैक्ट में आए 40 से ज्यादा लोगों को संक्रमण हुआ था।

जम्मू में रेड जोन में आनेवाले इलाकों में टेस्टिंग के बावजूद 15 अप्रैल के बाद से कोई केस नहीं मिला है। वहीं कश्मीर घाटी में गुरुवार को 33, शुक्रवार को 25 और शनिवार को 25 नए केस मिले थे।


30 अप्रैल को जम्मू में इलाज ले रहे 4 केस मुस्कुराते हुए अस्पताल से घर लौटे और डॉक्टर्स-मेडिकल स्टाफ ने तालियां बजाकर उनका हौसला बढ़ाया।

हालांकि जम्मू को कोविड फ्री घोषित करने से पहले डिप्टी कमिश्नर जम्मू ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा कि, जिले के सभी 26 केस ठीक होकर घर जा चुके हैं, लेकिन अभी एहतियात बरतनी होगी।

जम्मू कश्मीर सरकार के प्रवक्ता रोहित कंसल के मुताबिक, उनकी कोशिशें सफल हो रही हैं और लॉकडाउन फायदेमंद रहा है। रोहित कंसल के मुताबिक वह हर दिन 1800 लोगों की जांच कर रहे हैं और कुछ दिन में 2000 की करने लगेंगे। जम्मू कश्मीर में 254 लोग ठीक हो चुके हैं। 74 हजार को कोविड सर्विलेंस में रखा गया था और उनमें से 56 हजार ने 28 दिन का सर्विलांस पूरा भी कर लिया है।

जम्मू में मरीजों की कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की गई। मरीज के संपर्क में आने वाले लोगों को पहले ही क्वारैंटाइन कर दिया गया।

आखिर जम्मू ने किया क्या?

8 मार्च को जम्मू में कोरोना वायरस का पहला पॉजिटिव केस मिला था। इस पर जम्मू की डिप्टी कमिश्नर सुषमा चौहान ने तुरंत एक्शन लिया। मरीज कारगिल का रहने वाला था और उसकी ईरान की ट्रैवल हिस्ट्री थी। उससे मिलने वाले सभी लोगों की पहचान की गई और उन्हें क्वारैंटाइन किया गया। सैम्पल लेने से पहले सभी को क्वारैंटाइन कर दिया गया था।

रिपोर्ट्स पॉजिटिव आए उससे पहले जिला प्रशासन ने कंटेन्मेंट प्लान पर काम शुरू कर दिया था। 11 मार्च से स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी बंद कर दिए थे और सरकारी दफ्तर की बायोमैट्रिक एटेंडेंस भी।

फिर मॉल्स, सिनेमा हॉल और भीड़ वाले बाजार बंद कर दिए गए। मार्च के पहले हफ्ते में ही एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन और बस स्टॉप पर यात्रियों की स्क्रीनिंग की जा रही थी। होटल से मेहमानों की ट्रैवल हिस्ट्री मांगी गई। इसी के साथ सभी धार्मिक स्थल मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों और चर्च को बंद कर दिया गया।


18 मार्च को बंद कर दी वैष्णोदेवी यात्रा

17 मार्च को माता वैष्णोदेवी श्राइन बोर्ड ने एडवायजरी जारी की और 18 से यात्रा बंद कर दी। इसी दिन इंटर स्टेट बस सर्विस और गाड़ियों की आवाजाही को भी रोक दिया गया। जम्मू कश्मीर की सीमा लखनपुर को सील कर दिया गया और भीतर आनेवालों के लिए 14 दिन का क्वारैंटीन अनिवार्य कर दिया।

इस दौरान जम्मू में 6 डॉक्टर और एक हेल्थ वर्कर पॉजिटिव पाए गए। अब वे सभी ठीक होकर घर जा चुके हैं। इन सभी के परिवार वालों को भी नियम के मुताबिक क्वारैंटाइन किया गया। जिनमें से कुछ पॉजिटिव भी मिले और अब वे सब भी ठीक हो गए हैं।

अब हेल्थ डिपार्टमेंट के लोग घर-घर जाकर स्क्रीनिंग कर रहे हैं। जिसमें आशा वर्कर और सरकारी कर्मचारी शामिल हैं। सबसे बड़ी चुनौती पॉजिटिव केस के कॉन्टैक्ट में आए लोगों की पहचान करना था।

पुलिस ने निजामुद्दीन मरकज से आए लोगों और धार्मिक नेताओं की पहचान करने के लिए तब्लीगी लिंक के लोगों की स्क्रीनिंग की। इसी के साथ रोहिंग्या बस्ती में घनी आबादी के बीच भी स्क्रीनिंग की गई।

जम्मू में कोरोना का पहला मरीज 8 मार्च को आया था। उसके बाद इस डिविजन में टेस्टिंग बढ़ा दी गई।

कश्मीर से क्या गलतियां हुईं?

कश्मीर में इसके उलट लोगों को बाहर से लौटे यात्रियों के स्क्रीनिंग न करवाने का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। जनवरी से मार्च का वक्त उन कश्मीरियों की घर वापसी का समय था जो हर बार सर्दियों में जम्मू, दिल्ली या घाटी से कहीं और चले जाते हैं। बाहर से लौटने वाले विदेश से लौटे लोग भी शामिल हैं।

एयरपोर्ट पर प्रशासन ने हेल्प डेस्क और स्क्रीनिंग काउंटर बनवाया है। लेकिन लोगों ने ओहदे और पहुंच का फायदा उठाया और स्क्रीनिंग को बायपास कर वहां से निकल लिए।

कइयों ने तो अपनी ट्रैवल डिटेल्स छिपाई और बाद में उनमें कोरोना के लक्षण मिले। यही नहीं ये लोग कई और लोगों से मिले जुले भी और बाद में पुलिस को इनके कॉन्टैक्ट में आए लोगों का पता लगाने में पसीने आ गए। कश्मीर में धार्मिक स्थलों को बंद करने का फैसला काफी बाद में लिया गया जिससे कई पॉकेट्स में कोरोना काफी गहरे फैल गया।

कश्मीर में सबसे ज्यादा प्रभावित बांदीपोरा, यहां 52 पॉजिटिव

बांदीपोरा में एक तब्लीगी धार्मिक नेता के संपर्क में आने से 40 से ज्यादा लोगों को संक्रमण फैला। बांदीपोरा कश्मीर का सबसे प्रभावित जिला है जहां 52 में से 48 केस गुंड जहांगीर गांव के एक ही मोहल्ले डांगेरपोरा के हैं। इस मोहल्ले के सभी लोगों के कोरोना टेस्ट करवाए गए। जिसमें 700 से ज्यादा नेगेटिव भी आए।

कश्मीरियों ने पहले तो ट्रैवल हिस्ट्री छिपाई। लेकिन, जब श्रीनगर में कोरोना से पहली मौत हुई तो उसके बाद खुद ही प्रशासन को फोन कर इसकी जानकारी देने लगे।

जनाजे में शामिल हुए सैंकड़ो लोग

कश्मीर के सोपोर में स्थानीय गांववालों ने आतंकवादियों के जनाजे में शामिल होकर सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाईं। 9 अप्रैल को शोपियां में जैश के एक आतंकी के जनाजे में 400 से ज्यादा लोग शामिल हुए। जिसके बाद प्रशासन ने आतंकवादियों के शव परिवार को सौंपना और उनके नाम पब्लिक करना बंद कर दिया।

25 अप्रैल को अनंतनाग में एक गर्भवती महिला और उनके जुड़वां बच्चों की मौत हो गई थी। उसके शव को यूं ही घरवालों को दे दिया था, बाद में उस महिला का टेस्ट पॉजिटिव आया था। उसके जनाजे में कई लोग शामिल हुए थे।

26 मार्च को पहली कोरोना संक्रमित की मौत हुई थी। मरने वाला श्रीनगर के डाउनटाउन का एक 65 वर्षीय आदमी था। पहली मौत के बाद लोगों ने प्रशासन को कंट्रोल रूम में फोन लगाने शुरू किए और जानकारियां देने लगे। हर दिन 400-500 लोगों की जानकारियां प्रशासन को मिलने लगी।

इससे पहले सिर्फ लोग छिप रहे थे। लेकिन इसके बाद प्रशासन ने भी आतंकवादियों को ढूंढने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले नेटवर्क को कोरोना मरीजों को ढूंढने में इस्तेमाल किया।

कई इलाकों में हेल्थ वर्कर और स्क्रीनिंग के लिए आए कर्मचारियों पर पथराव भी किए गए। 18 अप्रैल को हेल्थ वर्कर की टीम बांदीपोरा गई थी। ये दो पॉजिटिव केस को लेने गए थे। इन पर स्थानीय लोगों ने पथराव कर दिया और कर्मचारी को चोटें आई थीं।



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जम्मू और कश्मीर में कुल 666 केस अब तक मिले हैं, जिनमें से 606 कश्मीर डिविजन में और 60 जम्मू डिविजन में।


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आज 3 मई है। आपको पता ही होगा कि कोरोना वॉरियर्स का शुक्रिया अदा करने के लिए आर्मी बैंड आज देशभर के कोविड अस्पतालों के बाहर परफॉर्मेंस देंगे। लेकिन, क्या आपको ये पता है कि ये आर्मी बैंड्स, यानी संगीत के सैनिक बनते कहांहैं? यानी इनकी ट्रेनिंग कहां होती है? इसकी भी एक रोचक कहानी है। तो पढ़िए...

देश में संगीत के सैनिकों की ट्रेनिंग की एकमात्र जगह है पचमढ़ी। यहीं है आर्मी म्यूजिक स्कूल। 70 साल पुराना यह म्यूजिक स्कूल एशिया का सबसे बड़ा और दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मिलिट्री म्यूजिक स्कूल है। पहले नंबर पर आता है लंंदन कामिलिट्री म्यूजिक स्कूल।

अंतरराष्ट्रीय स्तर की डिजिटल म्यूजिक ट्रेनिंग के लिए पचमढ़ी में बने भारतीय सेना के मिलिट्री म्यूजिक विंग को आईएसओ सर्टिफिकेट भी मिल चुका है। 1997 में सबसे बड़े मिलिट्री बैंड के लिए इसका नाम गिनीज बुक में दर्ज हुआ था।

पचमढ़ी में 70 साल पुराना यह आर्मी म्यूजिक स्कूल एशिया में सबसे बड़ा है।

यहां देश के 51 म्यूूजिक बैंड और 10 हजार से ज्यादा म्यूजिक सोल्जर तैयार हुए हैं। यही नहीं भारत के अलावा श्रीलंका, अफगानिस्तान, माली, भूटान, म्यांमार, नेपाल जैसे 14 देशों के अफसर-जवान भी यहां म्यूजिक की ट्रेनिंग लेते हैं।

सैनिकों के लिए यहां 3 महीने से लेकर 148 हफ्तों के दस कोर्स चलाए जाते हैं। सेना के अलावा नौसेना, वायुसेना के साथ पुलिस, असम राइफल, सीआरपीएफ, बीएसएफ, पैरामिलिट्री फोर्सेसभी अपने सैनिक-अफसरों को यहां ट्रेनिंग के लिए भेजती हैं।

यहां पर श्रीलंका, अफगानिस्तान, भूटान, म्यांमार, नेपाल जैसे 14 देशों के सैनिक म्यूजिक सीखने आते हैं।

संगीत ने पहुंचाया जवान से कमिशन ऑफिसर तक
मेजर विमल जोशी सेना के म्यूजिक विंग की सबसे खूबसूरत कहानी हैं। वह बतौर जवान भर्ती हुए थे और आज कमिशन ऑफिसर हैं। यही नहीं इन दिनों वो दिल्ली स्थित आर्मी हेडक्वार्टर में डायरेक्टर ऑफ मिलिट्री बैंड हैं। बिना एसएसबी पास किए वह सिर्फ संगीत के दम पर ऑफिसर बने हैं।


वह भारतीय सेना में होने वाली सभी बैंड ट्रेनिंग कर चुके हैं। इलाहाबाद की प्रयाग संगीत समिति से संगीत प्रभाकर पास हैं। सेना बैंड के लिए कई सारी धुन और गाने कंपोज करने चुके हैं। कैप्टन जोशी दस साल के थे जब उन्होंने संगीत सीखना शुरूकिया।

देश में कोई भी ऐसा इंस्टीट्यूट नहीं जो मिलिट्री म्यूजिक बैंड के सभी इंस्ट्रूमेंट के साथ हिंदुस्तानी संगीत के यंत्र सिखाता हो। ये स्पेशलाइजेशन सिर्फ सेना के मिलिट्री म्यूजिक विंग के पास है। भारतीय मिलिट्री में वेस्टर्न म्यूजिक अंग्रेजों के समय से था, फिर 1997 में भारतीय संगीत को शामिल किया गया।

यहां मिलिट्री म्यूजिक बैंड के सभी इंस्ट्रूमेंट के साथ जवानों को हिंदुस्तानी संगीत के यंत्र भी सिखाए जाते हैं।

संगीत के साथ कॉम्बैट ट्रेनिंग भी
पचमढ़ी में म्यूजिक सीख रहे ऑफिसर-सोल्जर को फायरिंग की ट्रेनिंग भी दी जाती है। यहां आने के लिए हर जवान को म्यूजिक एप्टीट्यूड टेस्ट के साथ फिजिकल टेस्ट भी पास करना होता है। हर जवान की कैम्प सिक्योरिटी की नाइट ड्यूटी लगती है। ट्रेनिंग पूरी होने पर अपनी यूनिट में जाकर वह आम सैनिकों की तरह कॉम्बैट में हिस्सा भी लेते हैं। सीमा की रखवाली करते हैं और जरूरत पड़े तो युद्ध भी लड़ते हैं। ट्रेनिंग के दौरान हर सैनिक का दिन सुबह 4 बजे शुरूहोता है। सबसे पहले रियाज, फिर 6 बजे से पीटी और फिजिकल ट्रेनिंग। फिर 8 बजे से 10 बजे तक म्यूजिक ट्रेनिंग। उसके बाद कुछ घंटो का ब्रेक और शाम को गेम्स। फिर रात को थ्योरी क्लास। विंग में पंडित उदय भट्‌ट 21 सालों से क्लासिकल म्यूजिक सिखा रहे हैं।


युद्ध शुरू होने के लिए बजने वाला बिगुल होया युद्ध के दौरान सैनिकों में जोश भरने के लिए वीर रस का गीत। युद्ध में जीत मिलने पर गौरव गान होया शहादत के बाद श्रदांजलि। सेना के बैंड की जरूरत हर जगह होती है। संगीत सचमुच सीमाओं के पार ले जाता है। फिर चाहे वह दो देशों की सीमाएं हो। मिलिट्री के कड़े अनुशासन के बीच रैंक चाहे कोई भी हो संगीत सभी साथ सीखते हैं।

अभी तक महिलाओं को नहीं मिला मौका
अफसोस ये है कि भारतीय सेना की महिलाएं अब तक इस विंग में शामिल नहीं हुई हैं। कारण, इस विंग में केवल जवानों के स्तर पर एंट्री मिलती है। और भारतीय सेना में अब भी महिलाएं बतौर जवान भर्ती नहीं होतीं।



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पचमढ़ी के आर्मी स्कूल में देश के 51 म्यूूजिक बैंड और 10 हजार से ज्यादा म्यूजिक सोल्जर तैयार हुए हैं।


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Friday, May 1, 2020

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महाराष्ट्र से साइकिल से चले एक प्रवासी मजदूर की मध्यप्रदेश के बड़वानी में शुक्रवार को मौत हो गई। मृतक का नाम तबरक अंसारी है, वह उत्तर प्रदेश का रहने वाला था। अंसारी महाराष्ट्र के भिवंडी से दो दिन पहले उत्तरप्रदेश के लिए रवाना हुआ था। पुलिस मान रही है किज्यादा थकान, गर्मी और शरीर में पानी की कमी होने की वजह से अंसारी की मौत हो गई।
पोस्टमार्टम के बाद मौत की सही वजह पता चलेगी
अंसारी के साथ 10 अन्य मजदूरभी रवाना हुए थे। उनमें से एक ने बताया कि लॉकडाउन में कामकाज छूटने की वजह से पैसे और खाने की व्यवस्था नहीं थी। साइकिल सेमहाराजगंज स्थित घरलौटने का फैसला लिया। 350 किमी दूरी तय करने के बाद अंसारी चक्कर खाकर सड़क पर गिर गया। मौत की वजह पोस्टमॉर्टम के बाद पता चलेगी।
बड़वानी में 11 दिन में प्रवासी मजदूर की मौत का तीसरा मामला
मध्यप्रदेश का बड़वानी जिला महाराष्ट्र की सीमा से लगता है। यहां 28 अप्रैल को 45 साल के मजदूर की चैकपोस्ट पार करते वक्त मौत हो गई थी। इससे पहले 21 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के मजदूर ने दम तोड़ दिया था। वह पैदल ही लौट रहा था।
सरकार प्रवासियों को भेजने के इंतजाम कर रही
केंद्र ने सभी राज्य सरकारों से कहा है कि प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुंचाने के लिए बसों की व्यवस्था की जाए। प्रवासी मजदूरों और छात्रों के लिए विशेष ट्रेनें भी चलाई जा रही हैं। सरकार ने लॉकडाउन 17 मई तक बढ़ा दिया है लेकिन, ऑरेंज और ग्रीन जोन वाले इलाकों में कई छूट दी गई हैं।



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यह फोटो मध्यप्रदेश के मिसरोद रेलवे स्टेशन की है, जहां शनिवार को श्रमिक स्पेशल ट्रेन महाराष्ट्र से प्रवासी मजदूरों को लेकर पहुंची।


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लॉकडाउन में फंसे लोगों की घर वापसी के लिए रेलवे ने 6 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें शुरू की हैं। इनके जरिए मजदूरों और प्रवासियों की घर वापसी सुनिश्चित कराई जा रही है। इसके लिए कई तरह की शर्ते भी रखी गई हैं। लोगों को भेजने वाले और बुलाने वाले राज्यों की सरकारों के आग्रह पर ही विशेष ट्रेनें चलेंगी। शुरुआती और स्टेशन के बीच में ट्रेन कहीं नहीं रुकेंगी। श्रमिकों को ट्रेन में बैठाने से पहले स्क्रीनिंग करवाना राज्य सरकार की जिम्मेदारी होगी। जिन लोगों में लक्षण नहीं होंगे उन्हें ही जाने की इजाजत मिलेगी।

शुक्रवार को ये छह ट्रेनें रवाना हुईं
1. जयपुर (राजस्थान) से पटना (बिहार)
2. कोटा (राजस्थान) से हटिया (झारखंड)
3. नासिक (महाराष्ट्र) से लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
4. नासिक (महाराष्ट्र) से भोपाल (मध्य प्रदेश)
5. लिंगम्पल्ली (तेलंगाना) से हटिया (झारखंड)
6. अलुवा (केरल) से भुवनेश्वर ( ओडिशा)


मध्यप्रदेश:
छह डिब्बों की ट्रेन 345 मजदूरों को लेकर भोपाल शनिवार को भोपाल के मिसरोद स्टेशन पहुंची। जिन लोगों के पास पैसे नहीं थे, उनके टिकट जिला प्रशासन ने खरीदे। मप्र सरकार दूसरे राज्यों में फंसे प्रदेश के करीब 40 हजार मजदूरों को बसों के जरिए ले आई है। अब छह राज्यों में फंसे एक लाख छह हजार मजदूरों को वह ट्रेन के जरिए वापस लाएगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शनिवार को रेल मंत्री से बात कर 80 से 100 ट्रेनें मांगेंगे और रूट तय करेंगे।

राजस्थान:
राजस्थान के जयपुर से जयपुर-पटना ट्रेन से 1200 यात्री रवाना हुए। वहीं, कोटा से एक हजार छात्र रवाना किए गए। हालांकि अभी यह जानकारी नहीं मिली है कि ये छात्र किन राज्यों के हैं। मुख्य सचिव डीबी गुप्ता ने बताया कि श्रमिक और प्रवासी भारतीय रेलवे को निर्धारित साधारण श्रेणी का किराया देकर विशेष ट्रेनों में यात्रा कर सकेंगे। यात्री जल्द एवं सुरक्षित घर पहुंच सकें, इसके लिए अधिकारी रेलवे के साथ लगातार समन्वय कर रहे हैं।

आंध्रप्रदेश:
हैदराबाद के लिंगमपल्ली स्टेशन से 1200 प्रवासी मजदूरों को लेकर स्पेशल ट्रेन शुक्रवार देर रात रांची के हटिया रेलवे स्टेशन पहुंची। ट्रेन से उतरने के बाद मजदूरों के चहरों पर मुस्कान दिख रही थी। इस दौरान रेलवे, पुलिस-प्रशासन के अधिकारी मौजूद रहे। ट्रेन से उतरने के बाद मजदूरों को सोशल डिस्टेंसिंग के तहत स्टेशन के बाहर लाया गया। फिर स्क्रीनिंग के बाद उन्हें उनके जिले के लिए स्टेशन के बाहर लगे बस में बिठाकर घरों की ओर रवाना किया गया।

महाराष्ट्र
महाराष्ट्र सरकार ने 74 बसों के जरिए राजस्थान के कोटा में फंसे सभी छात्रों को वापस बुला लिया है। इन्हें पहले पुणे ले जाया गया है। यहां इनकी जांच होगी और क्वारैंटाइन किया जाएगा।



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runs special trains and bus for migrant labour, students in india


from Dainik Bhaskar /national/news/runs-special-trains-and-bus-for-migrant-labour-students-in-india-127265278.html
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easysaran.wordpress.com

भोपाल/जयपुर/नासिक/पटना. लॉकडाउन में फंसे लोगों की घर वापसी के लिए रेलवे ने 6 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें शुरू की हैं। इनके जरिए मजदूरों और प्रवासियों की घर वापसी सुनिश्चित कराई जा रही है। इसके लिए कई तरह की शर्ते भी रखी गई हैं। लोगों को भेजने वाले और बुलाने वाले राज्यों की सरकारों के आग्रह पर ही विशेष ट्रेनें चलेंगी। शुरुआती और स्टेशन के बीच में ट्रेन कहीं नहीं रुकेंगी। श्रमिकों को ट्रेन में बैठाने से पहले स्क्रीनिंग करवाना राज्य सरकार की जिम्मेदारी होगी। जिन लोगों में लक्षण नहीं होंगे उन्हें ही जाने की इजाजत मिलेगी।

शुक्रवार को ये छह ट्रेनें रवाना हुईं
1. जयपुर (राजस्थान) से पटना (बिहार)
2. कोटा (राजस्थान) से हटिया (झारखंड)
3. नासिक (महाराष्ट्र) से लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
4. नासिक (महाराष्ट्र) से भोपाल (मध्य प्रदेश)
5. लिंगम्पल्ली (तेलंगाना) से हटिया (झारखंड)
6. अलुवा (केरल) से भुवनेश्वर ( ओडिशा)


मध्यप्रदेश:
छह डिब्बों की ट्रेन 345 मजदूरों को लेकर भोपाल शनिवार को भोपाल के मिसरोद स्टेशन पहुंची। जिन लोगों के पास पैसे नहीं थे, उनके टिकट जिला प्रशासन ने खरीदे। मप्र सरकार दूसरे राज्यों में फंसे प्रदेश के करीब 40 हजार मजदूरों को बसों के जरिए ले आई है। अब छह राज्यों में फंसे एक लाख छह हजार मजदूरों को वह ट्रेन के जरिए वापस लाएगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शनिवार को रेल मंत्री से बात कर 80 से 100 ट्रेनें मांगेंगे और रूट तय करेंगे।

राजस्थान:
राजस्थान के जयपुर से जयपुर-पटना ट्रेन से 1200 यात्री रवाना हुए। वहीं, कोटा से एक हजार छात्र रवाना किए गए। हालांकि अभी यह जानकारी नहीं मिली है कि ये छात्र किन राज्यों के हैं। मुख्य सचिव डीबी गुप्ता ने बताया कि श्रमिक और प्रवासी भारतीय रेलवे को निर्धारित साधारण श्रेणी का किराया देकर विशेष ट्रेनों में यात्रा कर सकेंगे। यात्री जल्द एवं सुरक्षित घर पहुंच सकें, इसके लिए अधिकारी रेलवे के साथ लगातार समन्वय कर रहे हैं।

आंध्रप्रदेश:
हैदराबाद के लिंगमपल्ली स्टेशन से 1200 प्रवासी मजदूरों को लेकर स्पेशल ट्रेन शुक्रवार देर रात रांची के हटिया रेलवे स्टेशन पहुंची। ट्रेन से उतरने के बाद मजदूरों के चहरों पर मुस्कान दिख रही थी। इस दौरान रेलवे, पुलिस-प्रशासन के अधिकारी मौजूद रहे। ट्रेन से उतरने के बाद मजदूरों को सोशल डिस्टेंसिंग के तहत स्टेशन के बाहर लाया गया। फिर स्क्रीनिंग के बाद उन्हें उनके जिले के लिए स्टेशन के बाहर लगे बस में बिठाकर घरों की ओर रवाना किया गया।

महाराष्ट्र:
महाराष्ट्र सरकार ने 74 बसों के जरिए राजस्थान के कोटा में फंसे सभी छात्रों को वापस बुला लिया है। इन्हें पहले पुणे ले जाया गया है। यहां इनकी जांच होगी और क्वारैंटाइन किया जाएगा।



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runs special trains and bus for migrant labour, students in india


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