Saturday, December 26, 2020

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हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार ने तमाम सरकारी कामों की शुरुआत बेटियों की पूजा से करने को कहा है। यानी आने वाले दिनों में सरकारी महकमे बेटियों के पांव धोते और उन्हें तिलक लगाते दिख जाएंगे। यह एक तरह का सरकारिया एलान है कि भई हमने तो स्त्री को शक्ति मान लिया। देखो, उसकी पूजा भी कर दी। अब तो खुश!

लेकिन क्या इससे कुछ भी बदलने वाला है? क्या पूजा होते ही लड़कियों के आसपास एक सुनहरा घेरा बन जाएगा, जो सड़क से लेकर दफ्तर तक ताक में बैठे मर्दों को रोकेगा! घूरो मत, छेड़ो मत, हाथ न लगाओ, फलां लड़की कल-परसों या बीते साल पूजी गई थी। न! ये सब कुछ नहीं होगा, बल्कि होगा ये कि माथे पर तिलक की जगह जख्म ले लेगा,आंखों में चमक की जगह आंसू होंगे और जिन हाथों ने पांव धोए थे, उनमें से ही कोई हाथ उसके वजूद को रौंद रहा होगा।

कुल मिलाकर सच यही है कि देवी की तरह पूजी जाती लड़कियां मर्दाना धरती पर उनकी मामूली नुमाइंदा तक नहीं बन पाई हैं। उन्हें देवी, माता, रूहानी ताकत से भरपूर मानने वाला देश उन पर ही हिंसा के नए कीर्तिमान बना रहा है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) का 2019 का डेटा बताता है कि 4 लाख से ज्यादा औरतों ने सालभर में किसी न किसी किस्म की गंभीर हिंसा की शिकायत दर्ज करवाई। ये आंकड़ा 2018 से 7.3%ज्यादा रहा।

ये तो हुई उन मामलों की बात जो पुलिस की फाइलों में दर्ज हो पाते हैं। कितने मामले किसी रिकॉर्ड में आने से रह जाते हैं, यह समझने के लिए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) ने पुलिस के साथ मिलकर एक सर्वे कराया। नतीजों ने अधिकारियों को चौंका दिया। इसके मुताबिक यौन शोषण के लगभग 99.1% मामले सामने ही नहीं आ पाते। इनमें से ज्यादातर मामले कम उम्र लड़कियों के साथ उन्हीं के रिश्तेदारों से जुड़े होते हैं। तब देवी को किसी मामा, किसी चाचा-ताऊ या पिता की इज्जत के हवाले से चुप करा दिया जाता है।

कोरोना महामारी के दौरान देवियां की पूजा और तबीयत से हो रही है। ज्यादातर दफ्तर बंद हैं, कामकाज घर से हो रहे हैं। अब जब बीवी सारा दिन आंखों के सामने डोलेगी, तो शौहर बेचारा आखिर करे भी क्या! तो बेचारों ने खलिहर बीवी के साथ मारपीट शुरू कर दी। NCRB के मुताबिक, घरों में किसी भी तरह की हिंसा सहने वाली लगभग 86% औरतें कभी मुंह नहीं खोलतीं। यौन हिंसा, मारपीट या तानों की सुई हद से ज्यादा कोंचने पर कभी-कभार रो-भर लेती हैं।

कई वेबसाइट्स खंगाली। सब की सब इस डेटा पर आंखें चौकोर किए दिखीं। इतनी हिंसा! इतनी चुप्पी! लेकिन मुझे या बहुतेरी औरतों को इससे कोई हैरानी नहीं होगी। हम सारी औरतें इसी माहौल में पली-बढ़ी हैं। हरेक के साथ मर्दाना हिंसा का एक पूरा चैप्टर साथ चलता है। सड़क पर चलते हुए, दफ्तर में की पैड पर अंगुलियां टकटकाते या फिर शॉपिंग मॉल में कपड़ों का ट्रायल लेते हुए ये चैप्टर दिमाग से किसी जोंक की तरह चिपका रहता है।कोई सुई होती है, तो हर घड़ी टिकटिकाती है कि बचो,अब अंधेरा हो गया। बचो, यहां सुनसान है। बचो, कि तुम औरत हो।

अब लौटते हैं देवियों से औरतों की तुलना पर

औरतों को दुनियावी मोह-राग से परे देवी बनाने का चलन पुरुषों के लिए हरदम ही काफी काम का साबित होता रहा। सबसे जबर्दस्त टोटका तो औरत को त्याग की देवी बनाना है। इस देवी का कोई चेहरा नहीं है। न ही ये फूल-धान-पूजा मांगती है। तो होता ये है कि देवी के इस ओहदे पर एक-दो नहीं, बल्कि सारी औरतों को बैठाया जाता है। इसका कोई अंत या शुरुआत भी नहीं। पांच साल की बच्ची को अपनी फेवरेट चॉकलेट छह साल के भाई के लिए छोड़ने को कहा जाता है। ज्यों ही बच्ची ने चॉकलेट परे की, उसे ममता की देवी बना दिया जाता है। ये प्रक्रिया चलती रहती है। बीवी प्रमोशन के समय दफ्तर से छुट्टी लेती है, ताकि पति के दोस्तों के लिए शानदार दावत पकाए। बच्चे के लिए मांएं नौकरी ऐसे छोड़ती हैं, जैसे कोई बुरी आदत छोड़ता हो।

कोई 'शातिर' औरत देवी की बजाए इंसान होना चुने, तो उसकी खैर नहीं। पकड़-धकड़कर किसी न किसी देवी की कुर्सी पर बांध ही दिया जाता है। औरत अगर तब भी छूट निकले, तो दनादन उसके चरित्र का स्तुतिगान शुरू हो जाएगा। यानी बनना है तो सीधे देवी बनो या फिर हमें तुमको वेश्या बनाते देर नहीं लगेगी। बचपन में पांव पूजन के बाद से कब्र तक औरत अपना इंसान होना भूली रहे, इसके लिए तमाम जतन होते हैं।

एक बड़ा ही मजेदार वाकया याद आता है। बेटी के जन्म के समय हालात कुछ ऐसे बने कि मेरी इमरजेंसी सर्जरी करनी पड़ी। लोकल एनेस्थीसिया दिया गया था तो मैं आराम से डॉक्टरों से हंस-बोल रही थी। बस आंखें ढंकी हुई थीं। सर्जरी पूरी हुई। बच्चे के रोने की आवाज सुनते ही रोके हुए आंसू एकदम से ढुलकने लगे कि तभी डॉक्टर की आवाज आई- 'रोओ मत, लक्ष्मी आई है'... वो मेरी फेवरेट डॉक्टर थी। पास आकर लगभग फुसफुसाते हुए ही बोली- 'अगली बार फिर कोशिश करना'। आंसुओं के बीच ही मैं जोरों से हंस पड़ी। जी में आया कि आंखों से पट्टी हटाकर डॉक्टर की तसल्ली को दोनों हाथों से पोंछ दूं। मुझे लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा या अन्नपूर्णा कुछ नहीं चाहिए। मुझे जो चाहिए था, वो मिल चुका। वो देश का नामी अस्पताल था। और मेरी डॉक्टर के नाम इंटरनेट पर फाइव स्टार हैं। लेकिन, इससे फर्क ही क्या पड़ता है!

पुराने समय में जब अल्ट्रासाउंड नहीं था, तब बच्ची के जन्म के साथ ही उसे अफीम चटा दी जाती। एक और तरीका था, जिसमें दूध की परात में बच्ची का सिर डुबोकर तब तक रखा जाता, तब तक कि हिलने या रोने जैसे मासूम प्रतिरोध भी रुक जाएं। राजस्थान में एक क्रूरतम तरीके के बारे में सुना था कि वहां चारपाई के पाये के नीचे बच्ची का सिर दबा दिया जाता था। एक आवाज में बच्ची की मौत हो जाए, तो अगली संतान लड़का होना तय है। इस परंपरा को मानने वाले लोग परिवार-समेत चारपाई पर बैठ जाते।

अल्ट्रासाउंड आया तो हत्या का बोझ अपने सिर लेने की जरूरत खत्म हो गई। अब सरकारें सख्त हैं। और फिर हम पर भी सभ्य दिखने का दबाव है। लिहाजा अल्ट्रासाउंड के समय सिले हुए मुंह बच्ची का चेहरा देखते हुए खुल पड़ते हैं। बधाइयों के बहाने तसल्ली दी जाती है कि भाईसाहब, रोओ मत, लक्ष्मी आई है। कोई भूले से भी नहीं कहता कि बिटिया की बधाई हो।

देवी के नाम पर एक-दूसरे को सांत्वना देते लोग तभी पक्का कर लेते हैं कि बेटी आ तो गई, लेकिन इसे इंसान नहीं, देवी ही बनाए रखना है। बस, गर्भ से बाहर निकली ये बच्ची लक्ष्मी से होते हुए अन्नपूर्णा और जाने क्या-क्या होती रहती है। क्यों नहीं, लड़के के जन्म पर कोई कहता कि बधाई हो फलां देवता आए हैं। नहीं, क्योंकि लड़का होना अपने-आप में एक खूबी है, तो इसे किसी देवता के नाम से ढंकने की क्या जरूरत!

ये जरूरत तो लड़कियों के लिए है। दशकों से यही चला आ रहा है और शायद सदियों तक चले। ये बदलेगा, जब हम खुद को देवी बनाए जाने से इनकार कर दें। हम इंसान हैं। तमाम चोटों, खामियों और खूबियों से भरे हुए। ठीक वैसे ही, जैसे कोई मर्द।



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The truth is that girls worshiped like Goddesses have not been able to become their nominal representatives on the masculine earth.


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दिल्ली की सीमाओं पर तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन को एक महीना हो चुका है। यहां अब बुजुर्गों की तुलना में युवा प्रदर्शनकारी अधिक हैं। टीकरी बॉर्डर और सिंघू बॉर्डर पर मीलों तक फैले ट्रालियों के काफिले के दोनों तरफ अब ट्रैफिक चलने लगा है। ट्रेक्टरों पर बैठे युवा तेज आवाज में संगीत बजाते हुए और नारेबाजी करते हुए गुजरते रहते हैं। कई बार उनके हाथों में लाठियां भी होती हैं। उनके नारे उग्र हो जाते हैं।

ऐसे ही एक ट्रेक्टर को रोकते हुए एक बुजुर्ग प्रदर्शनकारी ने कहा, 'हम यहां आंदोलन में मारे गए किसानों की मौत का गम मना रहे हैं, कोई जश्न नहीं।' ये सुनकर युवाओं ने लाउडस्पीकर पर बज रहा संगीत बंद कर दिया और ट्रैक्टर को पीछे घुमा लिया। अगले दिन एक बुजुर्ग किसान नेता मंच से ऐलान कर रहे थे, 'ट्रैक्टर पर स्पीकर बांध कर हुल्लड़बाजी ना करें। हमें गांधी और भगत सिंह के रास्ते पर चलना है। सब्र और त्याग हमारा रास्ता है। हमारे किसान मारे जा रहे हैं। ये आंदोलन है कोई जश्न नहीं।'

गुरविंदर सिंह चार युवाओं के साथ इनोवा कार से आए हैं। वो कहते हैं, 'मेरा पूरा गांव, खानदान यहीं है। मैं आज यहां पहली बार आया हूं, मेरा वापस लौटने का मन नहीं कर रहा है। हमारे गांव से और भी युवा पहुंच रहे हैं।' क्या उन्हें बुजुर्ग किसानों को ठंड में सड़क पर सोते हुए देखकर गुस्सा आता है? वे कहते हैं, 'गुस्सा होता तो हम हुल्लड़बाजी कर रहे होते, गुस्सा नहीं है, हम बुजुर्गों की तरह ही सब्र से काम ले रहे हैं।'

हरियाणा के सिरसा से आए राकेश कुमार अपने ग्रुप के साथ दो सप्ताह से टीकरी बॉर्डर पर प्रोटेस्ट में शामिल हैं। वो कहते हैं, 'बुजुर्गों को ठंड में कांपते देखकर बहुत बुरा लगता है। गुस्सा भी आता है। यहां बहुत परेशानियां हैं, लेकिन अपने हक के लिए इतना तो करना ही होगा।'

टीकरी बॉर्डर और सिंघू बॉर्डर पर हजारों की संख्या में युवा किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए आए हैं। वो बुजुर्ग किसानों में जोश भरने का काम कर रहे हैं।

राकेश कहते हैं, 'किसान पीछे हटने वाले नहीं हैं, सरकार को ही इस बारे में सोचना होगा। सरकार को देखना चाहिए कि दो युवा घर जा रहे हैं, तो उनके बदले दस आ रहे हैं।' राकेश के समूह में दिन भर आंदोलन की ही बात चलती है। वे सब एक दूसरे से यही पूछते रहते हैं कि सरकार कब मानेगी और वे कब घर लौटेंगे। कभी-कभी उन्हें इसे लेकर झुंझलाहट भी होती है, लेकिन बुजुर्ग किसानों को देखकर वे अपने मन को शांत कर लेते हैं।

रोहतास भी दो सप्ताह पहले प्रोटेस्ट में शामिल हुए थे। वो कहते हैं, 'टीवी पर आंदोलन की खबरें देखकर मेरा खून उबल रहा था। मुझसे घर में रहा नहीं गया और मैं यहां चला आया।' वे कहते हैं, 'किसानों को इस हालत में देखकर बहुत गुस्सा आता है। सबसे ज्यादा गुस्सा इस बात पर आता है कि सरकार हमारे बारे में कुछ कर नहीं रही। अभी दिल में क्या चल रहा है, ये बताया नहीं जा सकता।' रोहतास को लगता है कि वे देश के लिए और किसानों के लिए लड़ रहे हैं और इस लड़ाई में अगर उनकी जान भी चली जाए, तो इसकी परवाह नहीं हैं। परिवार को उनकी चिंता होती है तो समझा देते हैं कि 'देश से बढ़कर कुछ नहीं है।'

किसान 29 दिसंबर को सरकार से मिलने को राजी; शर्त- कानून वापसी पर विचार, MSP की गारंटी पर बात हो

टीकरी बॉर्डर पर पुलिस और किसानों के मंच के बीच हुई बैरिकेडिंग से एक घेरा बन गया है जिसमें दर्जनों युवा हाथ में लाठी लिए खड़े रहते हैं। ये यहां किसान आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच खड़े हैं और व्यवस्था संभाल रहे हैं। प्रदीप सिंह रोजाना सुबह 11 बजे यहां पहुंचते हैं और फिर रात 4 बजे तक यहीं रहते हैं। वे कहते हैं, 'हम सबसे आगे हैं, अगर कुछ हुआ तो सबसे पहले हम ही सामने आएंगे।' पंजाब के मोगा से आए प्रदीप कहते हैं, 'अभी तक धरना शांतिपूर्ण है, इसलिए डर की कोई बात नहीं है। ये बैरिकेड हमने अपने आप लगाए हैं ताकि कोई पुलिस पर पत्थर ना फेंक दे, शरारत ना कर दे या हुल्लड़बाजी से हंगामा ना हो जाए।'

युवा कहते हैं कि किसान पीछे हटने वाले नहीं हैं, सरकार को ही इस बारे में सोचना होगा। सरकार को देखना चाहिए कि दो युवा घर जा रहे हैं तो उनके बदले दस आ रहे हैं।'

आखिर वे कब तक यहां यूं ही हाथ में लाठी लिए खड़े रहेंगे? प्रदीप कहते हैं, 'हमारे नेता जो फैसला लेंगे हम वही करेंगे, अगर वो कहेंगे कि आगे बढ़ना है तो आगे बढ़ेंगे, कहेंगे यहीं रुकना हैं तो यहीं रुकेंगे।' कबड्डी खिलाड़ी फरियाद अली और उनके कोच रिंकू पटवारी भी किसानों के बीच खड़े हैं। वो युवाओं को आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। फरियाद कहते हैं, 'हम कबड्डी खिलाड़ी बाद में हैं, किसान के बेटे पहले, हम यहां युवाओं में जोश भरने आए हैं। सिर्फ मैं ही नहीं दूसरे पंजाबी कबड्डी खिलाड़ी भी यहां हैं। हमने अपने टूर्नामेंट रद्द कर दिए हैं।'

डॉ. अमित एक लोकगायक हैं और म्यूजिक वीडियो बनाकर यूट्यूब पर डालते हैं। वे भी आंदोलन में शामिल होने के लिए आए हैं। अमित कहते हैं, 'युवा होने के नाते ये देखकर निराशा होती है कि सरकार इतनी बड़ी तादाद में बैठे किसानों की बात नहीं सुन रही है।'

क्या उन्हें ये डर नहीं है कि आंदोलन में शामिल होने पर उन्हें निशाना भी बनाया जा सकता है। वो कहते हैं, 'अगर सरकार ऐसा करती है तो गलत करेगी। मेरे लिए तो ये अच्छा ही होगा क्योंकि इससे आंदोलन को और मजबूती मिलेगी।' टीकरी बॉर्डर पर बड़ी तादाद में शामिल युवा प्रदर्शनकारियों में अभी एक अनुशासन दिखता है। उन्होंने अपने गुस्से को थामा हुआ है। अनौपचारिक बातचीत में वो जरूर गुस्से का इजहार करते हैं, लेकिन कैमरे के सामने नपी-तुली भाषा में बोलते हैं।

ऐसे में एक सवाल मन में कौंधता है कि यदि ये युवा आंदोलनकारी बेकाबू हुए तो क्या होगा? इस सवाल पर किसान नेता जोगिंदर सिंह उगराहां कहते हैं, 'शुरू में हमें युवाओं के बेकाबू होने का डर था। लेकिन हम उन्हें ये समझाने में कामयाब रहे हैं कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन ही आंदोलन की ताकत है। हिंसा इस आंदोलन को हरा देगी।'



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टीकरी बॉर्डर पर पुलिस और किसानों के मंच के बीच हुई बैरिकेडिंग से एक घेरा बन गया है जिसमें दर्जनों युवा हाथ में लाठी लिए खड़े रहते हैं।


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1. हाल ही में जब एफसी बार्सिलोना के लिए लियोनेल मेसी ने 644 वां गोल किया तो उन्होंने मशहूर खिलाड़ी पेले के एक क्लब के लिए सबसे ज्यादा गोल करने के रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया। ऐसे कई रिकॉर्ड वे तोड़ चुके हैं। पढ़िए उनकी सक्सेस स्टोरी...

इंस्पायरिंग : छोटा कद लिए बड़े सपने के पीछे दौड़ते रहे, दिन में प्रैक्टिस और रात में इंजेक्शन लगवाते थे लियोनेल मेसी

2. थ्यूसिडिडीज़ बेहद अमीर परिवार से थे। एथेनियन इतिहासकार और जनरल भी थे। इतिहास में इन्होंने जो बदलाव किए थे, उनकी वजह से ही इनका काम मशहूर हुआ था। पढ़िए उनके कुछ विचार...

प्रेरणादायक : इतिहासकार थ्यूसिडिडीज़ के विचार जो आपमें भी उत्साह भर देंगे

3. संस्थान के माहौल को न समझ पाने और लगातार नकारात्मकता झेलने के बावजूद ज्यादातर लोग अपनी पुरानी नौकरी को छोड़ने में झिझकते हैं। ऐसा इसलिए कि वे बदलाव से डरते हैं, या करियर स्विच से होने वाले फायदों के बारे में सोच ही नहीं पाते हैं। ये संकेत आपको बताएंगे कि अब समय है बदलाव का ...

टिप्स : ये संकेत बताएंगे कि अब पुरानी नौकरी छोड़ नया काम शुरू करना चाहिए

4. आम धारणा है कि इंट्रोवर्ट्स में आत्मविश्वास की कमी होती है। ये महान हस्तियां भी इंट्रोवर्ट्स हैं, अपने क्षेत्र में बेहद सफल हैं पर इनमें कभी आत्मविश्वास की कमी नहीं देखी गई। पढ़िए इन नामी लोगों के बारे में...

इंस्पिरेशनल - इंट्रोवर्ट्स हैं, लेकिन आत्मविश्वास के बल पर सफल हुए



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1. यदि जीडीपी को विकास का पैमाना माना जाए तो पिछले बीस वर्षों में भारत ने अपनी विकास दर को बनाए रखा है। लेकिन, यह विकास जीवन स्तर की बेहतरी में नज़र क्यों नहीं आता? क्या जनता के स्वास्थ्य और खुशहाली के बिना विकास को पूर्ण माना जा सकता है? इसी सवाल की पड़ताल करती है यह स्टोरी क्या सचमुच में इसे ही विकास कहेंगे?

2. चक्र की मदद से कृष्ण शिशुपाल का शिरश्छेदन करते हैं जो उनका लगातार अपमान कर रहा था। वे चक्र से दुर्वासा ऋषि को विनम्रता भी सिखाते हैं। चक्र का केंद्र स्थिरता का प्रतीक है तो उसकी परिधि चेतना और तीलियां बौद्ध धर्म के विभिन्न सिद्धांतों का प्रतीक। चक्र एक है और उसका महत्व अनंत है। इसकी इसी अहमियत के बारे में बता रहे हैं प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों के जाने-माने आख्यानकर्ता देवदत्त पटनायक...
चक्र अस्त्र की तरह नाश करता है तो विनम्रता भी सिखाता है, आखिर क्या है इसकी अहमियत?

3. सलमान की शख्सियत इतनी अलहदा है कि जो भी इनसे जुड़ता है, उसकी कई खास यादगारें बन जाती हैं। सलमान खान के जन्मदिवस के मौके पर उनसे जुड़ी यादें भास्कर को साझा कर रही हैं जानी-मानी फिल्म लेखिका, समीक्षक और इतिहासकार भावना सोमाया...

सलमान खान : दिल में आते हैं, समझ में नहीं

4. वेब सीरीज़ ‘स्कैम 1992’ के कई डायलॉग्स में जीवन प्रबंधन को लेकर कई तरह के अहम सबक छिपे हैं। कैसे ये डायलॉग्स हमारी जिंदगी को बदलने में अहम भूमिका निभा सकते हैं, जानिए मोटिवेशनल स्पीकर और लेखक डॉ. उज्ज्वल पाटनी से...

वेब सीरीज़ ‘स्कैम 1992’ के डायलॉग्स में भी छिपे हैं जीवन और व्यापार के लिए कई सबक

5. दो सबसे बड़ी और कामयाब फिल्में दो ऐसे लोगों ने बनाईं, जो मुंह में सोने की चम्मच लेकर पैदा नहीं हुए थे। एक का नाम था के. आसिफ और दूसरे का नाम था महबूब ख़ान। एक ने बनाई ‘मुग़ल-ए-आज़म’ और दूसरे ने बनाई ‘मदर इंडिया।’ महबूब ख़ान के जीवन संघर्ष के बारे में बता रहे हैं राजकुमार केसवानी ...

'मदर इंडिया' फिल्म बनाने वाले महबूब ख़ान ने 30 रुपए महीने की नौकरी से की थी करिअर की शुरुआत...

6. कोविड-19 से निपटने के लिए कुछ देशों में टीकाकरण शुरू हो चुका है। भारत सहित अन्य देशों में भी यह जल्दी ही शुरू हो जाएगा। आज की स्थिति में कम से कम पांच वैक्सीन कंपनियां स्क्वैलिन का उपयोग कर रही हैं। स्क्वैलिन शार्क के लिवर से मिलता है। इस वजह से लाखों शार्क मारी जा सकती हैं। पढ़ें यह शोधपरक रिपोर्ट...

वैक्सीन का निर्माण कहीं शार्क के लिए संकट ना बन जाए!

7. भारतीय टीम के पूर्व सलामी बल्लेबाज सुनील गावस्कर ने कप्तान विराट कोहली की पैटरनिटी लीव पर सवाल उठाकर भारतीय क्रिकेट में भेदभाव के आरोपों को एक बार फिर से हवा दे दी है। इस पूरे मुद्दे की पड़ताल भास्कर 360 में....

बीसीसीआई में भाई-भतीजावाद, टीम इंडिया में कप्तान पर पहले भी लगे हैं पक्षपात के आरोप



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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY) को वर्चुअली लॉन्च किया। इस योजना में जम्मू-कश्मीर के हर परिवार को पांच लाख का हेल्थ इंश्योरेंस मिलेगा। ये योजना कई राज्यों में पहले से ही चल रही है। जम्मू-कश्मीर ऐसा पहला राज्य है जहां के हर परिवार को इस स्कीम का लाभ मिलेगा।

AB-PMJAY सेहत योजना क्या है? अब तक कितने लोग इस योजना का लाभ ले चुके हैं? जम्मू कश्मीर में योजना बाकी राज्यों से कितनी अलग है? स्कीम का लाभ लेने के लिए किन कागजात की जरूरत होगी? किस आधार पर मिलेगा कवर? जहां सिर्फ गरीबों के लिए ये योजना है, वहां किन लोगों के नाम दर्ज होंगे? आइए जानते हैं…

AB-PMJAY सेहत योजना क्या है?
23 सिंतबर 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रांची से AB-PMJAY सेहत योजना को लॉन्च किया था। योजना के तहत आने वाले परिवारों को हर साल 5 लाख तक का हेल्थ इंश्योरेंस कवर मिलता है। अब तक इस योजना के दायरे में जो राज्य थे वहां के 22 करोड़ 66 लाख से ज्यादा परिवारों में से 13 करोड़ 4 लाख से ज्यादा परिवार योजना के लिए एलिजिबल थे। जम्मू कश्मीर के करीब 37 लाख से ज्यादा परिवार शनिवार से इस स्कीम में और जुड़ गए हैं।

अब तक कितने लोग इस योजना का लाभ ले चुके है?
21 सितंबर 2020 तक कुल 1 करोड़ 26 लाख लोगों ने AB-PMJAY सेहत योजना के तहत इलाज कराया। इनमें से 5 लाख 13 हजार मरीज ऐसे थे जिन्हें कोरोना के चलते अस्पताल में भर्ती किया गया।

देशभर में 24 हजार से ज्यादा हॉस्पिटल ऐसे हैं, जहां सेहत कार्ड से मरीज को इलाज की सुविधा मिल सकती है। दिल्ली, ओडिशा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल को छोड़कर पूरे देश में ये योजना लागू हो चुकी है।

योजना का लाभ लेने में गुजरात सबसे आगे है। यहां पिछले दो साल में 19 लाख 37 हजार से ज्यादा लोग योजना की मदद से अपना इलाज करा चुके हैं। दूसरे नंबर पर तमिलनाडु और तीसरे पर केरल है।

दिल्ली, ओडिशा, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में योजना क्यों नहीं?

  • केंद्र सरकार ने जब योजना लॉन्च की, उस वक्त योजना में वही लोग शामिल थे, जो 2011 की जनगणना में गरीबी रेखा से नीचे थे। दिल्ली, ओडिशा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और केरल सरकार ने योजना का विरोध किया और कहा कि इनके राज्यों में पहले से चल रही स्वास्थ्य से जुड़ी योजनाएं, केंद्र की स्कीम से बेहतर हैं। केंद्र अगर इन राज्यों से बेहतर स्थिति लाता है, तो ही वो अपने राज्यों में इस स्कीम को लागू करेंगे।
  • हालांकि, बाद में केरल इस योजना को लागू करने के लिए सहमत हो गया और महज 1 साल के अंदर यहां के 13 लाख से ज्यादा लोगों को इस योजना का फायदा हुआ।

योजना के लिए पैसे कहां से आ रहे हैं ?
फंड के लिए कुछ राज्यों ने एक नॉन-प्रॉफिटेबल ट्रस्ट बनाया है, जहां उन्होंने अपने बजट से हेल्थ केयर फंड निकाला है। केंद्र सरकार इसमें लगभग 60% योगदान करती है। किसी मरीज के इलाज में खर्च होने वाले पैसे सीधे अस्पताल के खाते में ट्रांसफर होते हैं। दूसरा मॉडल ये है कि राज्य सरकारें स्वास्थ्य बीमा करने के लिए निजी बीमा कंपनियों के साथ भागीदारी कर रही हैं। कुछ राज्यों ने एक मिश्रित मॉडल का भी चयन किया है, जहां निजी बीमा कंपनियां छोटे भुगतान को कवर करती हैं और बाकी को सरकारी ट्रस्ट द्वारा फंड दिया जाता है।

इस योजना में कौन-कौन सी बीमारियां कवर होती हैं?
योजना में पुरानी बीमारियां भी कवर होती हैं। किसी बीमारी में अस्पताल में एडमिट होने से पहले और बाद के खर्च इसमें कवर होते हैं। ट्रांसपोर्ट पर होने वाला खर्च इसमें कवर होता है। सभी मेडिकल जांच, ऑपरेशन, इलाज जैसी चीजें इसमें शामिल हैं।

स्कीम के लिए कौन से कागजात की जरूरत होती है?
पहचान के लिए आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड या राशन कार्ड दिखा सकते हैं। नेशनल हेल्थ एजेंसी (NHA) ने आरोग्य मित्रों को अस्पतालों में तैनात किया है। इनके पास मरीजों की पहचान सत्यापित करने और उन्हें इलाज में मदद करने का काम है। पूछताछ और समाधान के लिए भी मरीज इन लोगों से संपर्क कर सकते हैं।

किस आधार पर कवर मिलता है?
जम्मू कश्मीर के हर नागरिक को इस कार्ड से इलाज मिल सकेगा। देश के बाकी राज्यों में 2011 के सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना में गरीब के तौर पर चिह्नित किए गए सभी लोग इसके पात्र होते हैं। मतलब अगर कोई शख्स 2011 के बाद गरीब हुआ है, तो वह कवर से वंचित हो जाएगा। बीमा कवर के लिए उम्र, परिवार के आकार को लेकर कोई बंदिश नहीं है। लाभार्थी सरकारी या निजी अस्पताल में हर साल 5 लाख रुपए तक का कैशलेस इलाज करा सकेंगे।

कैसे चेक करेंगे अपना नाम?
NHA ने इसके लिए वेबसाइट और हेल्पलाइन नंबर लॉन्च किया है, जिसके जरिए कोई भी नागरिक यह जांच सकता है कि फाइनल लिस्ट में उसका नाम शामिल है या नहीं। इसके लिए mera.pmjay.gov.in वेबसाइट देख सकते हैं या हेल्पलाइन नंबर 14555 पर कॉल कर सकते हैं। रजिस्ट्रेशन के बाद मैसेज के जरिए मोबाइल पर आईडी नंबर मिलेगा।



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Narendra Modi; Explained Ayushman Bharat Yojana | Who Benefited The Most? All You Need To Know About AB PMJAY SEHAT Scheme


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मोदी सरकार का पूरा साल कोरोना से निपटने के लिए गाइडलाइन बनाने और देश को लॉक-अनलॉक करने में गुजर गया। इन सबके बीच सरकार ने कुछ बड़े फैसले लिए और कुछ नए कानून भी बनाए। दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक तीन दिन पहले प्रधानमंत्री ने श्री राम जन्मभूमि ट्रस्ट बनाने का ऐलान किया। कोरोना के बीच संसद खुली और सरकार ने किसानों से जुड़े ताबड़तोड़ तीन कृषि बिल संसद में पास करवा लिए। अब इन्हीं बिलों के खिलाफ किसान सड़कों पर हैं। आत्मनिर्भर भारत अभियान भी सरकार ने शुरू किया। चलिए देखते हैं इस साल के सरकार के 12 सबसे बड़े फैसले, नीति और कानून कौन से रहे...



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Narendra Modi Government Top 10 Decisions Of 2020; Farm Bill | National Education Policy To Jammu Kashmir Hindi Official Language National Education Policy


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बीता साल 2020 भले इतिहास के पन्नों में कोरोना के नाम पर दर्ज हो, लेकिन राम भक्तों के जेहन में यह साल राम मंदिर की नींव पड़ने के लिए याद बनकर रहेगा। जब भारतीय संसद भवन का इतिहास पढ़ा जाएगा तो 2020 को याद करना पड़ेगा।

इसी तरह आने वाले साल, 2021 को वाराणसी में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का काम पूरा होने के लिए, मुंबई में देश की सबसे ऊंची रिहायशी इमारतों काम पूरा होने और उसमें लोगों के रहने के लिए याद किया जाएगा। इतना ही नहीं, 2021 मुंबई में शिवाजी स्मारक के खुलने का गवाह भी बन सकता है।

2020 में देश के पहले सी प्लेन ने भी उड़ान भरी। ऐसी उड़ानों के लिए देशभर में 10 वाटर एयरोड्रोम यानी नदी, झील या डैम पर बनने वाले हवाईअड्डे बनाए जाने हैं। अंडमान निकोबार में तीन ऐसे जलीय हवाई अड्डों का काम शुरू हो चुका है।

एक तरफ 2020 ऐसी परियोजनाओं की शुरुआत के लिए तो 2021 उनमें से कई के पूरा होने के लिए जाना जाएगा। आइए ऐसे 9 खास प्रोजेक्ट के बारे में जानते हैं...

तेजी से बनेंगे वाटर एयरपोर्ट्स, सी-प्लेन के पहले यात्री थे पीएम मोदी

अक्टूबर 2020 में भारत में सी-प्लेन सेवा शुरू हो गई है। इसके पहले यात्री प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बने। वे गुजरात के अहमदाबाद से केवड़िया स्थित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी गए। 200 किलोमीटर की ये यात्रा सी-प्लेन से 45 मिनट में पूरी हो गई। रोड से यही यात्रा 4 से 5 घंटे में पूरी होती है। पहली सफल सी-प्लेन सेवा के बाद अब भारत में वाटर एयरपोर्ट्स बनाने के प्रोजेक्ट में तेजी आ गई है।

  • भारत में कुल 10 वाटर एयरपोर्ट्स बनाने के प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है। सरदार सरोवर डैम और साबरमती रिवर फ्रंट के काम पूरे हो चुके हैं।
  • ओड़िशा के चिल्का लेक, अंडमान निकोबार के लॉन्ग आइलैंड, स्वराज आइलैंड और शहीद आइलैंड पर भी वाटर एयरपोर्ट्स बनाने का काम जारी है।
  • अंडमान निकोबार के तीन वाटर एयरपोर्ट्स बनाने की कुल लागत 50 करोड़ है। इनका निर्माण एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया कर रही है।

2350 करोड़ में बनकर तैयार हो गए हैं भारत के सबसे ऊंचे रिहायशी टावर


2021 की पहली तिमाही में भारत की दो सबसे ऊंची रिहायशी इमारतों में ग्राहकों को पजेशन मिलना शुरू हो जाएगा। मुंबई के लोवर परेल में स्थित वर्ल्ड वन टावर और वर्ल्ड वन व्यू टावर 76-76 फ्लोर के हैं। इनकी ऊंचाई 935 फीट है। मुंबई में ही 78 माले की इमारत द पार्क भी है। लेकिन, इसकी ऊंचाई 879 फीट है। उधर, 2020 में अमेरिका में दुनिया की सबसे ऊंची रिहायशी इमारत तैयार हो गई।

  • वर्ल्ड वन पहले 117 फ्लोर और 1450 फीट ऊंचा बनने वाला था, लेकिन एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया से अनुमति न मिलने पर 76 मंजिला बना।
  • वर्ल्ड वन टावर को 17.5 एकड़ जमीन पर बनाया गया है। इसकी लागत 2350 करोड़ रुपये से ज्यादा बताई जाती है। इसे लोधा ग्रुप ने बनाया है।
  • दुनिया की सबसे ऊंची रिहायशी इमारत न्यूयॉर्क का सेंट्रल पार्क टावर है। यह 131 मंजिला और 1549 फीट ऊंचा है।

चार धाम प्रोजेक्ट पर टिकी हैं लाखों यात्रियों की नजर


उत्तराखंड का चार धाम प्रोजेक्ट 2021 में अंतिम चरण में पहुंच सकता है। प्रोजेक्ट के तहत केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को आपस में जोड़ा जा रहा है। इसके लिए 889 किलोमीटर का हाईवे बन रहा है। नई सड़कें, सुरंगें और नए पुल बनाने के साथ पुरानी सड़कों को चौड़ा करने का काम 2020 में पूरा होना था। लेकिन पर्यावरण नियमों के उल्लंघन की शिकायतों के बाद काम रुक गया।

  • ऋषिकेश से धारासु होते हुए गंगोत्री, यमुनोत्री, रुद्रप्रयाग होते हुए केदारनाथ और बद्रीनाथ को जोड़ने वाली इस हाईवे परियोजना की लागत 12,000 करोड़ रुपए है।
  • 2016 में पीएम मोदी ने इसकी आधारशिला रखते हुए इसे उत्तराखंड त्रासदी में जान गंवाने वालों के लिए श्रद्धांजलि बताया था।
  • फिलहाल पर्यावरण उल्लंघन की शिकायतों को लेकर काम रुका हुआ है। परिवहन मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय हल निकाल रहे हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर से गंगा घाट तक सीधा रास्ता


वाराणसी में 2009 से चल रहे काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर का काम 2021 में पूरा हो सकता है। इसमें काशी विश्वनाथ मंदिर से ल‌लिता, जलासेन और मणिकर्ण‌िका घाट तक बाबा धाम बसाया जा रहा है। इसमें करीब 50,261 वर्ग मीटर में 24 नई बिल्डिंग बनाने और 63 छोटे-छोटे मंदिरों की मरम्मत का काम चल रहा है।

  • 50,261 वर्ग मीटर वाले कॉरिडोर का 70% हिस्सा खाली रहेगा। केवल 30% में कल्चरल सेंटर, वैदिक केंद्र, जप-तप भवन आदि बनेंगे।
  • कॉरिडोर क्षेत्र में कोई इमारत काशी विश्वनाथ मंदिर से ऊंची नहीं होगी। काशी विश्वनाथ के अलावा इस क्षेत्र में 63 अन्य मंदिर रहेंगे।
  • काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर बनाने की लागत 345.27 करोड़ रुपये तक पहुंचेगी। इसके अगस्त 2021 तक पूरा हो जाने के आसार हैं।

नई दिल्ली-वाराणसी बुलेट ट्रेन पर काम होगा शुरू


2021 में नई दिल्ली से वाराणसी के बीच हाईस्पीड रेल कॉरिडोर का काम शुरू हो जाएगा। सर्वे शुरू हुआ है। जापान के पीएम शिंजो आबे के 2015 के वाराणसी दौरे के ठीक पहले बुलेट ट्रेन पर समझौता हुआ था।

  • नई दिल्ली से वाराणसी की दूरी करीब 865 किलोमीटर है। इस रूट पर 300 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ेगी बुलेट ट्रेन।
  • नई दिल्ली से वाराणसी का सफर ढाई घंटे में होगा पूरा। बीच में मथुरा, आगरा, कानपुर और प्रयागराज पड़ेंगे।
  • नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी NHRCL भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण संरक्षण पर काम कर रहा है।

जोर पकड़ लेगा मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट


अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट पर काम कर रही कंपनी L&T को 25 हजार करोड़ के काम करने का ऑर्डर मिल गया है। 2021 में गुजरात के वापी से वडोदरा के बीच हाईस्पीड रेल कॉरिडोर बनाना शुरू हो जाएगा।

  • इस प्रोजेक्ट की शुरुआत 237 किलोमीटर के वापी-वडोदरा कॉरिडोर से होगी। पूरे प्रोजेक्ट में कुल 508 किलोमीटर का कॉरिडोर बनना है।
  • प्रोजेक्ट पर कुल 1.08 लाख करोड़ की लागत आएगी। फिलहाल केंद्र सरकार ने 25 हजार करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट दे दिया है।
  • प्रोजेक्ट के रूट में आने वाले पेड़ों को काटने के बजाय उन्हें शिफ्ट किया जाएगा।

आखिरी स्टेज में पहुंच जाएगा मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक का काम


मुंबई को नवी मुंबई से जोड़ने के लिए 22 किलोमीटर लंबा पुल बनाने का काम 2021 में आखिरी चरण में पहुंच जाएगा। पुल का 16.5 किलोमीटर हिस्सा समुद्र में और 5.5 किलोमीटर जमीन पर होगा। इसे मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक नाम दिया गया है। इस पुल के लिए कुल 2200 पिलर खड़े किए जा रहे हैं। यह शिवाजी मेमोरियल प्रोजेक्ट का एक हिस्सा है।

  • यह भारत का समुद्र में बनने वाला सबसे लंबा पुल होगा। इसको बनाने में 10 करोड़ रुपये की रिवर सर्कुलर मशीन लगाई गई थी।
  • अभी मुंबई से नवी मुंबई पहुंचने में एक घंटे तक का समय लगता है। मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक के बाद यह दूरी 20 से 25 मिनट में पूरी होगी।
  • मुंबई की भारी ट्रैफिक समस्या को कम करने में यह लिंक बड़ी भूमिका निभाएगा। 6 लेन वाले इस पुल पर 100 किलोमीटर प्रति घंटा से गाड़ियां दौड़ सकती हैं।

शिवाजी स्मारक पर आ सकता है फैसला, आखिरी चरण में है काम


अरब सागर में करीब 15 एकड़ के टापू पर लगभग 696 फीट ऊंचा शिवाजी स्मारक बनकर तैयार होने वाला है। मुंबई के गिरगांव चौपाटी से सटे समुद्र में करीब डेढ़ किलोमीटर अंदर टापू पर बन रहे स्मारक को देखने के लिए एक समय में 10 हजार लोग तक आ सकते हैं। हालांकि मॉनसून के वक्त अरब सागर से होकर स्मारक तक पहुंचने के तरीके पर विवाद होने के बाद महाराष्‍ट्र सरकार ने काम रोका हुआ है।

  • शिवाजी स्मारक के निर्माण में 1900 करोड़ की लागत लगी है।
  • मॉनसून के दौरान टापू की ओर जा रही एक मोटरबोट पलटने से एक शख्स की मौत हो गई। इस पर विवाद के बाद से काम रुक गया है। अब वहां के लिए टनल बनाने पर विचार हो रहा है।
  • इस स्मारक के निर्माण के लिए महाराष्ट्र की सभी नदियों से पानी लाया गया था। साथ ही शिवाजी के किले से मिट्टी भी मंगाई गई थी।

नए संसद भवन के निर्माण पर टिकी रहेंगी नजरें


10 दिसंबर 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए संसद भवन की आधारशिला रखी। सोशल मीडिया पर पहले ही इसके ‌निर्माण पर बहस जारी है। साथ ही देश के 69 पूर्व नौकरशाहों ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखकर इस प्रोजेक्ट को लेकर सवाल खड़े किए थे। सुप्रीम कोर्ट में प्रोजेक्ट को लेकर दायर याचिकाओं पर अभी सुनवाई होनी बाकी है। इस दौरान लगातार पेड़ों की शिफ्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद केंद्र ने सुनवाई पूरी न होने तक किसी भी तरह का निर्माण या शिफ्टिंग न करने का आश्वासन दिया है।

  • नए संसद भवन का निर्माण सेंट्रल विस्टा री-डेवलेपमेंट प्रोजेक्ट के तहत किया जा रहा है। इसमें नए संसद भवन के अलावा 3 किलोमीटर में केंद्रीय मंत्रालयों के लिए सरकारी बिल्डिंग, उपराष्ट्रपति के लिए नए ऐनक्लेव, पीएमओ और पीएम आवास में कई निर्माण होंगे।
  • इस प्रोजेक्ट के तहत संसद, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, उपराष्ट्रपति का घर, नेशनल म्यूजियम, नेशनल आर्काइव्ज, इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स, उद्योग भवन, बीकानेर हाउस, हैदराबाद हाउस, निर्माण भवन और जवाहर भवन के पूरे इलाके को रेनोवेट किया जाएगा।
  • इस प्रोजेक्ट को केंद्रीय लोक निर्माण विभाग यानी CPWD करीब 13,450 करोड़ में पूरा करेगा। आजादी के 75 साल पूरे होने पर नए भवन में संसदीय सत्र चलने की उम्मीद है।

राम मंदिर में नहीं होगा कोई जोड़, लगेंगी 10 हजार कॉपर प्लेट


अयोध्या में राम मंदिर की नींव रखी जा चुकी है। काम की शुरुआत 1200 पिलर गाड़ने से होनी थी। लेकिन जमीन की जांच के लिए गाड़े गए पिलर धंसने के बाद काम रोक दिया गया। अब आईआईटी मुंबई, आईआईटी दिल्ली, आईआईटी गुवाहाटी, आईआईटी चेन्नई, सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट रुड़की के वर्तमान और रिटायर्ड वैज्ञानिक और प्रोफेसर, टाटा और लार्सन एंड टूब्रो के सबसे तेज-तर्रार लोगों की टीम नई तकनीक पर काम कर रही है। जनवरी 2021 में मंदिर की नींव खोदी जानी है।

  • राममं‌दिर बरसों-बरस बना रहे इसके लिए विशेषज्ञों ने मंदिर निर्माण में लोहे या सरियों का इस्‍तेमाल न करने की सलाह दी है। इसलिए देशभर के लोगों से कॉपर की प्लेट और रॉड दान करने की अपील की गई थी।
  • मंदिर निर्माण में 10 हजार कॉपर की प्लेट्स लगाई जाएंगी। यह 18 इंच लंबी, 30 एमएम चौड़ी और 3 एमएम मोटी होंगी। दान देने वाले इन पर अपना नाम लिखकर भेज सकते हैं।
  • लोगों की मांग थी कि ऐसा मंदिर बने जिसका भवन कम से कम 1000 वर्ष टिका रहे, लेकिन मंदिर निर्माण में लगी लार्सन एंड टूब्रो और टाटा कंसल्टेंसी ने हाथ खड़े कर दिए। अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने कहा कि 300-400 साल की गारंटी दें तब भी ठीक है।


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