Saturday, June 13, 2020

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दोपहर 3 बजकर 15 मिनट…इंडिगो की दिल्ली फ्लाइट राजा भोज एयरपोर्ट के रनवे पर उतर चुकी थी। इस फ्लाइट से उतरे यात्री सेल्फ डिक्लेयरेशन फॉर्म भरने के बाद अपनी थर्मल स्क्रीनिंग कराकर बाहर निकल रहे थे। इस दौरान अराइवल गेट के बाहर दंपति टकटकी लगाए खड़े थे। जब उनसे बात की तो पता चला वे अपने बच्चों को लेने आए हैं।

दोपहर 3 बजकर 40 मिनट पर इंडिगो का स्टाफ दो बच्चों की थर्मल स्क्रीनिंग कराकर उन्हें अराइवल गेट पर लाया। 97 दिन बाद अपने बच्चों को सामने देखकर मां के चेहरे पर जो खुशी थी वो देखने लायक थी। मां ने दौड़कर अपने साढ़े तीन साल के बेटे को गले लगाना चाहा लेकिन एयरलाइन स्टाफ ने रोक दिया।

स्टाफ ने पहले पेरेंट्स की आईडी चेक की उसके बाद दोनों बच्चों को उनके हवाले किया। इसके बाद साढ़े तीन साल का बच्चा अपनी मां से लिपट गया, दोनों के चेहरे पर खुशी और आंखें नम थी।

8 मार्च को गए थे नानी के घर, तब से वहीं थे दोनों बच्चे

भोपाल कीमिनाल कॉलोनी में रहने वाले मूलचंद शर्मा ने बताया कि उनका साढ़े तीन साल का बेटा माधव और 13 साल की बेटी दिव्यांशी 8 मार्च को अपनी नानी के घर मोदीनगर, गाजियाबाद गए थे। यहां से उनके मामा उन्हें लेकर गए थे। 23 मार्च को वापसी का टिकट था, लेकिन लॉकडाउन हो गया और बच्चे अपनी नानी के घर ही रह गए।

बच्चों से मिलने से पहले मां को दिखाना पड़ा अपना आईडी प्रूफ।

नानी के घर सुरक्षित थे बच्चे फिर भी हमें उनकी चिंता रहती थी, रोजाना करते थे वीडियो कॉल

मूलचंद ने बताया कि दोनों बच्चे अपनी नानी के घर पूरी तरह से सुरक्षित थे, लेकिन मां-बाप होने के नाते हमें उनकी चिंता रहती थी। हम दोनों रोजाना ऑडियो-वीडियो कॉल पर उनसे बात करते थे। 25 मई से डोमेस्टिक फ्लाइट्स शुरू हो गई थीं लेकिन यूपी-दिल्ली बॉर्डर सील थे इसलिए बच्चे मोदीनगर से दिल्ली एयरपोर्ट तक नहीं पहुंच सकते थे। लिहाजा हमें और इंतजार करना पड़ा, तीन-चार दिन पहले ही वहां बॉर्डर खुला, तभी हमने बच्चों की टिकट बुक करा दी। पहले यह तय हुआ कि मेरी वाइफ सुबह की फ्लाइट से जाकर बच्चों को लेकर आ जाएगी। लेकिन हमें ऐसी कोई फ्लाइट नहीं मिली।

राजा भोज एयरपोर्ट के बाहर अपने बेटे माधव और बेटी दिव्यांशी के साथ माता-पिता।

इंडिगो स्टाफ ने परिवार की तरह रखा बच्चों का ख्याल
13 जून को सुबह बच्चों के मामा ने उन्हें दिल्ली एयरपोर्ट पर छोड़ा, वहां से इंडिगो स्टाफ ने बच्चों की पूरी जिम्मेदारी संभाली। स्टाफ ने दोनों बच्चों का पूरी जर्नी में परिवार की तरह ही ख्याल।हवाई यात्रा में आरोग्य सेतु एप होना जरूरी है इसलिए हमारी बेटी के पास एक मोबाइल था। उस पर हम बात करके हाल-चाल भी ले रहे थे।

भोपाल स्थित राजा भोज एयरपोर्ट।


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राजा भोज एयरपोर्ट पर एक मां जब तीन महीने बाद अपने साढ़े तीन साल के बेटे से मिली तो कुछ इस अंदाज में गले से लगाया।


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पहली कहानी ओडिशा के सुंदरगढ़ से... समरुति, रेखा, निशांत, आदिल, कुसुम, समीर, वर्षा, कुणाल, कुम, बिरजिनिया, निखिल... ऐसे 21नाम हैं। ये कुछ उन यतीम बच्चों के नाम हैं, जो लॉकडाउन के बीच सुंदरगढ़ में बिसरा के ‘दिशा शेल्टर होम' में पहुंचे हैं। लहुनीपाड़ा की समरुति 45 दिन की है और उससे थोड़ी ही छोटी खटकुल बहाल की रेखा है, जिसकी उम्र महज 34 दिन है। दोनों की मां ने उन्हें सरेंडर कर दिया, यानी ये मांएं खुद अपने बच्चे को पाल नहीं सकतीं।

कोरोना इन बच्चों के लिए कहर साबित हुआ है। खासकर गरीब बच्चों के लिए। कोई अपने नवजात को अडॉप्शन सेंटर में छोड़कर जा रहा है, तो कोई अपने बच्चों को किसी गांव में या फिर सड़क पर लावारिस रखकर चला जा रहा है। जो कमाने कहीं गए थे, लॉकडाउन खुलने के बाद भी लौटे ही नहीं। उनके बच्चे यतीम हो गए हैं। भटक रहे हैं।

ब्राह्मणी तरंग के निशांत को 22 दिन पहले कोई सड़क पर छोड़कर चला गया था। यही कहानी आदिल की है, जो जनता कर्फ्यू यानी, 22 मार्च के अगले ही दिन शेल्टर होम पहुंचा। इन नवजातों के यह नाम शेल्टर होम वालों के ही दिए हुए हैं। इन बच्चों के माता-पिता कौन हैं, कोई नहीं जानता।

इनमें से कोई सड़क पर पड़ा मिला तो कोई चुपचाप इन्हें पालना घर के बाहर छोड़ गया। दिशा चाइल्डलाइन में 39 बच्चे हैं, 17 बड़े बच्चे हैं। जिनमें से 7 तो हमारे सामने ही यहां आए। वहीं22 नवजात हैं, इनमें 4 लॉकडाउन के दौरान आए हैं।

सुंदरगढ़ के ग्रामीण इलाकों में 27% बच्चे ट्रैफिकिंग के शिकार हैं, खासकर बच्चियां, इनमें से 40% बच्चियां तो लौटती ही नहीं हैं।

पांच बच्चों को सोता हुआ छोड़ गए मां-बाप
बिसरा के शेल्टर होम में पांच भाई-बहन कुसुम, समीर, वर्षा, कुणाल और कुम मांझी पहुंचे। इनमें सबसे बड़ी कुसुम 14 साल की है। सुंदरगढ़ जिले के राजगांगपुर के भगत टोला-भाटीपाड़ा के पास लॉकडाउन के कुछ दिन पहले इनके मां-बाप रात में इन्हें सोता हुआ छोड़कर चले गए। कहां गए-पता नहीं। ये बच्चे गांव की एक टूटी झोपड़ी में जिंदगी बसर कर रहे थे।

यह झोपड़ी इन बच्ची की नहीं, किसी और की थी। फिर भूख से जंग शुरू हुई। कुछ दिन गांव के लोगों ने कुछ खाने को दिया। सरकारी राशन इन्हें मिल नहीं सकता था, क्योंकि राशन कार्ड था नहीं। जिस गांव में मां-बाप ने इन्हें छोड़ा, वह इनका अपना नहीं था।

सबसे बड़ी कुसुम ने बताया कि ‘हम गोंड आदिवासी हैं। भूख लगी तो काम खोजा। छोटे-छोटे भाई बहन हैं। क्या करती? राजगांगपुर बाजार में एक घर में बर्तन-बासन का काम करने लगी। जो पैसे मिले उसी से सबको खिलाती थी। लॉकडाउन हुआ तो जहां काम करती थी, उन्होंने आने से मना कर दिया। कोरोना का डर था। फिर खाना मिलना बंद हो गया। लोगों को हमारे बारे में पता चला। चाइल्डलाइन को खबर मिली तो हम सब यहां चले आए।’

लॉकडाउन के कुछ दिन पहले पांच भाई-बहनों के मां-बाप रात में इन्हें सोता हुआ छोड़कर चले गए थे।

बाप सूरत कमाने गया तो लौटा ही नहीं
5 साल की बिरजिनिया और 3 साल के निखिल के बाप सूरत कमाने गए। लौटे ही नहीं। सालभर पहले मां, जलकर मर गई। बच्चों को उम्मीद थी कि लॉकडाउन में पिता लौट आएंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बच्चे दादी के पास रहते थे। सत्तर साल की दादी को डर सताने लगा कि महामारी में मैं चली गई तो इनका क्या होगा? दादी ने दोनों की परवरिश चाइल्डलाइन को सौंप दी। निखिल और बिरजिनिया भी हमारे सामने ही शेल्टर होम पहुंचे।

दिशा चाइल्डलाइन के सेक्रेटरी अबुल कलाम आजाद बताते हैं कि बच्चे कुछ दिन हमारे पास रहेंगे। आगे इनको हॉस्टल में रहने-पढ़ने का प्रबंध किया जाएगा। हम बच्चों को यहां इसलिए ले आए कि ये ट्रैफिकिंग के शिकार न हो जाएं।

सुंदरगढ़ में 27% बच्चे ट्रैफिकिंग के शिकार

1. ओडिशा एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग पायलट प्रोजेक्ट की रिपोर्ट कहती है कि सुंदरगढ़ के ग्रामीण इलाकों में 27% बच्चे ट्रैफिकिंग के शिकार हैं। खासकर बच्चियां।
2. इनमें सर्वाधिक 21% ट्रैफिकिंग बलिशंकरा ब्लॉक से होती है। सबडेगा, लेपहरीपाड़ा, कुतरा भी इसकी जद में हैं।
3. रिपोर्ट के मुताबिक बलिशंकरा की 40% बच्चियां तो लौटती ही नहीं हैं। आजाद के मुताबिक जिले में हर महीने सात-आठ बच्चों के गायब होने के मामले दर्ज होते है।

आजाद के मुताबिक लॉकडाउन, अनलॉक और उसके बाद सबसे बड़ा खतरा इसके बढ़ने का है। फिलहाल सुंदरगढ़ से 75 हजार से 1 लाख लड़कियां बाहर भेजी जाएंगी। हर साल हम 30-35 बच्चियों को रेस्क्यू करते हैं।

कहां जाती हैं ये बच्चियां?
1. बच्चियां केरल के टेक्सटाइल, इलायची व गोलमिर्च के बगानों में काम करने ले जाई जाती हैं।
2. सूरत में 10-12 श्रमिकों की टोली एक लड़की को खाना पकाने के लिए ले जाती है। श्रमिक उसे‘भाउजो'(भाभी) कहते हैं।
3. राजस्थान और हरियाणा के लोग तो शादी की नीयत से यहां से बच्चियां ले जाते हैं। लाठीकाटा ब्लॉक की एक बच्ची संध्या (परिवर्तित नाम) को काम दिलाने के नाम पर राजस्थान में बेच दिया गया। तब वह 14 साल की थी। पांच दिसंबर 2017 को गायब हुई थी। इसमें संध्या के रिश्तेदारों का ही हाथ था। हम उसे ले आए। 17 साल की संध्या एक बच्चे की मां है। बिनब्याही। आज संध्या अपने पिता के पास है।



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कोई अपने नवजात को अडॉप्शन सेंटर में छोड़कर जा रहा है, तो कोई अपने बच्चों को किसी गांव में या फिर सड़क पर लावारिस रखकर चला जा रहा है।


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मेरठ में जन्मेंथोरेसिक स्पेशलिस्टडॉक्टर अंकित भरत के नेतृत्वमें पहली बार किसीकोरोना मरीज के दोनों फेफड़ेट्रांसप्लांट किए गए हैं। अमेरिका के शिकागो के नार्थ-वेस्टर्न मेमोरियल हॉस्पिटल में किए गए इस काम की इसलिए चर्चा है क्योंकिकोरोनावायरस सबसे पहले फेफड़ों को ही निशाना बनाता है।

उनके हॉस्पिटल में यह सर्जरी 5 जून को की गई थी लेकिन मरीज की कंडीशन के तमाम पहलुओं को देखते हुए इसकी सफलता की घोषणा एक हफ्ते बाद की गई। हॉस्पिटल ने इसे एक माइलस्टोन बताया है।

दुनियाभर के वैज्ञानिक भारत के एक डॉक्टर परिवार के बड़े बेटेअंकित को बधाई देते हुए इस सर्जरी को इसलिए महत्वपूर्ण बता रहे हैं क्योंकि इसके बाद वेंटिलेटर पर तड़प रहे गंभीर रोगियों को ट्रांसप्लांट के जरिये बचाने की उम्मीद जगी है। हर साल करीब 50 लंग ट्रांसप्लांट करने वाले डॉक्टर अंकित के पास दुनियाभर से कॉल आ रहे हैं और ऐसे ट्रांसप्लांट की चाह रखने वालेमरीजों की लिस्ट लम्बी होती जा रही है।

शिकागो केहॉस्पिटल के लंग्स ट्रांसप्लांट प्रोग्राम के डायरेक्टर और सर्जन डॉक्टरअंकित भरत ने दैनिकभास्कर की ओर से भेजे गएसवालों के जवाब दिए। उन्होंने बताया, सर्जरी कितनी चुनौतीभरी रही और कोरोना महामारी को लेकरवह भारत की वर्तमान स्थिति को किस नजरिए से देखते हैं।

बातचीत से पहले 4 पांइट मेंपूरा केस

  • नॉर्थ वेस्टर्न हॉस्पिटल में 26 अप्रैल से भर्ती संक्रमित युवती कोविड आईसीयू की सबसे बीमार मरीज थी। उसे20 से भी कम उम्र में कोरोना ने इस तरह जकड़ लिया था किबचने की उम्मीद बहुत कम थी।
  • वायरस के कारण फेफड़ों मेंइतना नुकसान हो चुका था कि उनकाठीक होना संभव नहीं था। तमाम विकल्प आजमाने के बादडॉक्टर अंकित और उनकीटीमने उसके फेफड़े ट्रांसप्लांट करने का फैसला लिया।
  • डॉक्टर अंकित की सहयोगीडॉक्टरबेथ मालसिन ने बताया कि हमें दिन-रात यह देखना होता था कि उसके सभी अंगों तक पर्याप्त ऑक्सीजन पहुंच रही है या नहीं ताकि ट्रांसप्लांट के दौरान वे ठीक रहे।
  • इसके बाद जैसे ही उसकीकोरोना रिपोर्ट निगेटिव आई, हमनेट्रांसप्लांट की तैयारी शुरू कर दी। 48 घंटे बादफेफड़ों को ट्रांसप्लांट कर दिया। 10 घंटे तक चली यह सर्जरीसफल रही और अब मरीज रिकवरी स्टेज में है।

अबसवाल -जवाब

#1) ये सर्जरी इतनी महत्वपूर्ण क्यों बताई जा रही है? क्या आगे कोरोना के कारण मौत की कगार पर पहुंचे मरीजों के लिए जीवनदायक हो सकती है?
डॉक्टर अंकित:हां, ऐसा हो सकता है क्योंकि एक बार जब आपकाशरीर सक्षम हो जाता है तो वायरस को निकाल बाहर फेंकता है। और, इस तरह के लंग ट्रांसप्लांट की मदद से वे मरीज वेंटिलेटर से वापस लौट सकते हैं जिनकेफेफड़ों कोकोरोना वायरस के कारण गंभीर नुकसान पहुंच चुका होता है।

पहली फोटो, लंग्स ट्रांसप्लांटेशन से पहले हुए एक्स-रे की है। दूसरी फोटो, कोरोना मरीज के वो फेफड़े हैं जो पूरी डैमेज हो चुके थे और उसकी लगातार बिगड़ती हालत के बाद ट्रांसप्लांट किया गया।

#2) अगर मरीज के दोनों फेफड़े खराब हैं तो लंग ट्रांसप्लांटेशन में सबसे बड़ा चैलेंज क्या है?
डॉक्टर अंकित:ऐसे में सबसे बड़ा चैलेंज उस मरीज की बीमारी होती है और ये देखना होता है कि वो किस स्टेज पर है। आमतौर पर, ऐसे गंभीर मरीजों को हफ्तों तक नली लगाकर ऊपर से सांस देनी होती है क्योंकि वे बहुत कमजोर हो जाते हैं। ऐसे मामलों में मरीज के दूसरे अंगों पर भी बुरा असर पड़ता है और उनकी भी काम करने की क्षमता कम होती जाती है।

इसीलिए, ऐसे मरीजों में ट्रांसप्लांटेशन करना बहुत चैलेंजिंग काम होता है।इस सर्जरी में उम्र बहुत मायने रखती है क्योंकि हमें मरीज की इम्यूनिटी और रिकवरी की संभावनाओं के हिसाब से ये बेहद पेचीदा सर्जरी करनी होती है। मैचिंग डोनर का वक्त पर मिलना भी एक बड़ा चैलेंज है।

#3) कोरोना से जूझने में भारत की स्थिति और तैयारियों को आप कैसे देखते हैं?
डॉक्टर अंकित:यकीनन, ये दौर दुनिया के हर देश के लिए बहुत मुश्किल है और मैं कहूंगा कि जो हालात हैं उनको देखते हुए भारत बहुत अच्छा कर रहा है। मुद्दे की बात ये है कि अभी भी ये स्पष्ट नहीं है कि हमारे पास पब्लिक हेल्थ पॉलिसीज क्या होनी चाहिए क्योंकि ये वायरस अब जाने वाला तो नहीं है।

इससे आज भी लड़ना है और आने वाले कल में भी। हालांकि, अगर लोग अपने घर और कम्युनिटी के स्तर पर हाइजीन और बचाव की बुनियादी नियमों का पालन करेंगे तो इस वायरस के प्रभाव को बहुत हद तक कम किया जा सकता है।

यह तस्वीर 10 घंटे चली सर्जरी की है।डॉक्टर अंकित भरत के मुताबिक, ऐसी स्थितिसबसे बड़ा चैलेंज उस मरीज की बीमारी होती है और ये देखना होता है कि वो किस स्टेज पर है

#4) अमेरिका में रहकर आपने कोरोना के संकट को बहुत करीब से देखा है, भारत सरकार और भारतवासियों को कोई खास मैसेज देना चाहेंगे?
डॉक्टर अंकित:मुझे लगता है कि देश में एकता बनाए रखने, हाइजीन और मेडिकल रिसर्च के प्रमाणों को लेकर लोगों को जागरूक करने बतौर मीडिया हाउस आप लोग और सरकार बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। मैं ये भी सोचता हूं कि बतौर एक सोसायटी के रूप में हमें पर्सनल हाइजीन को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी खुद ही लेनी होगी और तभी हम कोविड-19 और भविष्य में होने वाली किसी भी ऐसी महामारी को फैलने से रोक पाएंगे। मैं यही मैसेज देना चाहता हूं कि हमें एक होकर लड़ना होगा, क्योंकि सामूहिक प्रयासों और सबके एक साथ आए बिना इस वायरस से जीतना संभव नहीं लगता।

#5) आप मेरठ से हैं और क्रिश्चियन कॉलेज से पढ़ें हैं, यूपी से शिकागो तक की यात्रा में भारत याद आता है?
डॉक्टर अंकित:हां, बिल्कुल। रोज याद आता है। भारत में पैदाइश और बड़े होने की यादें बहुत गुदगुदाती है। यहां अमेरिका में भारत का स्वादिष्ट और देसी खाना बहुत याद आता है।

12 जून को शिकागो में हॉस्पिटल के बाहर मीडिया को इस सर्जरी के बारे में बताते डॉक्टर अंकित। 2019 में उन्होंने ही पहली बार रोबोट की मदद से लंग सर्जरी की थी।

मेरठ से अमेरिका तक के सफर के 5पड़ाव

  • 1980 में मेरठ में जन्में डॉ. अंकित भरत ने 10वीं की पढ़ाई 1995 में मेरठ छावनी के सेंट मेरीज एकेडमी से की और डीपीएस आरकेपुरम से वर्ष 1997 में 12वीं की पढ़ाई पूरी की।
  • वेल्लोरके मशहूर क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई पूरी करके 2003 में इंटर्नशिप करने के बाद नई तकनीक सीखनेअमेरिका गए और फिर वहीं बस गए।
  • कॅरिअर के शुरुआती दिनों बतौर रेजिडेंट काम करने के बाद 2013 में नॉर्थवेस्टर्न मेमोरियल हॉस्पिटल में बतौर प्रोफेसर के पद पर नौकरी ज्वाॅइन की।
  • थोरेसिक सर्जन डॉ अंकित भरत नॉर्थवेस्टर्न मेमोरियल हॉस्पिटल में ही लंग्स ट्रांसप्लांट प्रोग्राम के डायरेक्टर बने। उन्हेंपिछले साल नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की ओर से अमेरिका की सबसे बड़ी17 करोड़ रुपए की आरओ-1 ग्रांट मिली है।
  • उनके पिता डॉ. भरत गुप्ता सुभारती मेडिकल कॉलेजके बायोकेमिस्ट्री डिपार्टमेंट में प्रोफेसर व एचओडी हैं और अंकित की मांडॉ. विनय भरत भी वहीं पैथोलॉजी विभाग में प्रोफेसर हैं। उनके छोटे भाईडॉ.अंचित भी अमेरिका के इंडियाना पोलिस स्टेट स्थित वेल्स मेमोरियल अस्पताल में फिजिशियन हैं।
बाएं से- डॉ अंकित अपनी मांडॉ. विनय भरत, पिता डॉ. भरत कुमार गुप्ता और भाईडॉ. अंचित भरत के साथ।


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Dr. Ankit, who transplanted both lungs of the Corona victim in America, said,


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ग़ालिब ने लिखा था-हमने माना कि तगाफुल * न करोगे लेकिन, खाक हो जाएंगे हम तुमको खबर होने तक ... (*तगाफुल - नजरअंदाज करना )...वाकई, आज कोरोना से मरने वालों की यही हालत है। चाहकर भी लोग अपनों को वक्त से पहले अलविदा कहने को मजबूर हैं। और लाचारी ऐसी कि, न तो आखिरी बार चेहरा देख पाते हैं और न ही ठीक से सुपुर्द-ए-खाक कर पाते हैं।

दुनियाभर में हालात और ज्यादा मनहूस होते जा रहे हैं।लोग जीते जी कोरोना के संक्रमण से नहीं बच पाए और मरने के बाद लाशों को दफनाने के लिए जगह कम पड़ गई है। लैटिन अमेरिकी देश ब्राजील के हालात ऐसे ही हैं। यहां केशहरसाओ पाउलो में तीन साल पुरानी कब्र को खोदकर हडि्डयां निकाली जाएंगी और नई लाशों को दफनाया जाएगा।

दुनियाभर से ली गईं अपनों से अंतिम विदाई की 10 फोटो जो बताती हैं कि इस दर्द की इंतेहा नहीं।

'कोविड-19 कब्रिस्तान' : 7 जून 2020 को ली गई यह फोटो त्रिनिदाद की है। यहां ऐसा कब्रिस्तान भी है, जहां केवल कोविड-19 के मरीजों की मौत के बाद उन्हें दफनाया जा रहा है। इसे 'कोविड-19 कब्रिस्तान' का नाम दिया गया है। अपनों की विदाई के अंतिम समय में भी पूरे परिवार के आने पर पाबंदी है।
ये सीढ़िया नहीं, कब्र हैं : पहली नजर में यह फोटो किसी सीढ़ीनुमा स्मारक जैसी दिखती है, असल में ये कब्र है। ब्राजील के सबसे बड़े शहर साओ पाउलो में कोरोना से मरने वालों के लिए 3 हजार कब्र खोदी गई हैं। तस्वीर 4 जून 2020 को ली गई है। ब्राजील में शुक्रवार रात मरने वालों का आंकड़ा 41 हजार 901 हो गया। इसके साथ ही मौतों के मामले ब्राजील ब्रिटेन से आगे निकल गया।
साथ और सांस दोनों छूटे : यह फोटो लंदन की है। कोविड-19 के संक्रमण से मौत के बाद कब्रिस्तान में जाने से पहले मरीज की सांस चेक करता मर्चुरीकर्मचारी। ब्रिटेन में कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा 41,481 पार कर चुका है। वहीं अब तक संक्रमण के 2,92,950 मामले सामने आ चुके हैं।
अंतिम विदाई : पेरू में लोगों को दफनाने के लिए शहरी क्षेत्र से दूर पहाड़ियों पर ले जाया जा रहा है। यहां के निवासी फ्लेविया जुआरेज की 50 साल की उम्र में कोरोना से मौत हुई। यहां बियर की बोतल के साथ मृतक को अंतिम विदाई देने का रिवाज है।
पिता का साथ छूटा : ब्राजील के मनौस में आदिवासी समुदाय के नेता मेसायस कोकाम की 14 मई को कोविड-19 से मौत हुई। उनकी अंतिम विदाई के पलों में बेटा मिक्वायस मोरेरा कोकामा। अप्रैल के अंत में कोरोनावायरस शहरी क्षेत्र से आदिवासी क्षेत्र में पहुंचना शुरू हुआ था।
दूर तक कब्र ही कब्र : 10 जून को ली गई यह फोटो मेक्सिको के शिको कब्रिस्तान की है। यह कब्रिस्तान शहर के अंतिम छोर पर है, जहां कोविड-19 से मरने वालों को दफनाया जा रहा है। कम पड़ती जगह के कारण कब्र को एक-दूसरे से सटाकर रखा गया है। इन दिनों कुछ मजदूर यहां दिनभर कब्र खोदने का ही काम कर रहे हैं।
पिता की कैप ही अब आशीर्वाद : यह हैं गेविन रॉबर्ट्स जो अपने पिता के फ्यूनरल में बैठे हैं। इनके पिता न्यूजर्सी के ग्लेन रिड में पुलिसकर्मी थे जिनकी मौत मई में कोरोना संक्रमण से हुई थी। अंतिम विदाई के दौरान पिता की डेडबॉडी को निहारने गेविन ने उनकी कैप लगाई हुई है।
जनाजों का जखीरा : यह फोटो न्यूयॉर्क के हार्ट आइलैंड की है, जहां कई शवों को अलग-अलग न दफनाकर एक साथ एक बार में दफनाया गया था। अप्रैल और मई में कोरोना से होने वाली मौत का आंकड़ा बढ़ने पर ऐसा किया गया था। फोटो 9 अप्रैल को ली गई थी।
कब्र में भी सुकून नहीं: मेक्सिको में भी दफनाने के लिए जगह कम पड़ रही है। इसलिए पुरानी कब्र को वापस खोदकर जगह बनाई जा रही है ताकि अधिक से अधिक लोगों को दफनाया जा सके।
अंतिम यात्रा पर निकले पिता को छू भी नहीं सकते: यह फोटो दिल्ली की है। जिसमें एक बेटा अपने पिता को दफनाने ले जा रहा है। पिता की मौत कोविड-19 के कारण हुई है। नियमों के मुताबिक, शव को छू नहीं सकते और न ही गले से लिपटकर रो सकते हैं। पार्थिव शरीर को खिसकाने और दूरी बनाए रखने के लिए रस्सी का इस्तेमाल किया जा रहा है।


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10 pictures of the last farewell to loved ones, which shows how much the epidemic has taken away and only pain


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मानसून पश्चिम बंगाल में गंगा के तटवर्ती इलाके और ओडिशा में सक्रिय है। शनिवार को यह मध्य महाराष्ट्र के कुछ और हिस्सों, मराठवाड़ा और विदर्भ के अधिकतर हिस्सों, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के बाकी हिस्सों, झारखंड के अधिकांश हिस्सों और बिहार के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ा है।

मध्य अरब सागर के शेष हिस्सों में और उत्तर अरब सागर के कुछ हिस्सों और महाराष्ट्र के शेष हिस्सों (मुंबई सहित), छत्तीसगढ़, झारखंड, दक्षिण मध्य प्रदेश और बिहार के हिस्सों और दक्षिण गुजरात के कुछ हिस्सों के लिए अगले 24 घंटों के दौरान आगे बढ़ने के लिए हालात अनुकूल बन रहेहैं। इन इलाकों में मानसून रविवार या सोमवार को दस्तक दे सकता है।

दक्षिण गुजरात सहित प्रदेश में अगले 3 दिन भारी बारिश की चेतावनी दी गई है। मध्य प्रदेश, विदर्भ, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल के पर्वतीय हिस्से, सिक्किम, असम, मेघालय, मध्य महाराष्ट्र, कर्नाटक में भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है।

मध्यप्रदेश: मानसून पहले होशंगाबाद, जबलपुर और इंदौर में दस्तक देगा

मानसून मप्र में तय समय 15 जून से एक दिन पहले रविवार को पहुंच सकता है। वरिष्ठ मौसम वैज्ञानिक एके शुक्ला ने बताया कि यह सबसे पहले होशंगाबाद, जबलपुर और इंदौर में दस्तक देगा। मानसून की उत्तरी सीमा हरनेई, अहमदनगर, औरंगाबाद, गोंदिया, चांपा, रांची, भागलपुर से गुजर रही है। इसकी अरब सागर एवं बंगाल की खाड़ी दोनों ब्रांच भी एक्टिव हैं। इस वजह से इसके जल्द ही भोपाल में भी पहुंचने की संभावना बढ़ गई है।

उधर, मानसून की आहट के साथ शनिवार को मालवा-निमाड़, महाकौशल, विंध्य के कई इलाकों में तेज बारिश हुई। जुन्नारदेव में 100, मेघनगर में 74, हरदा में 73, मंडला में 60 मिमी, खातेगांव में 58 मिमी में बारिश रिकॉर्ड हुई।

सियर जोन, जिसने मानसून को ज्यादा सक्रिय किया, रफ्तार दी
मौसम विशेषज्ञ शैलेंद्र कुमार नायक के मुताबिक पूर्वी और पश्चिमी हवाएं आपस में 19 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर मध्य भारत के आसपास 6 किमी ऊंचाई तक मिल रही हैं। इसे सियर जोन कहते हैं। इससे मानसूनी गतिविधियां तेज हो जाती हैं।

नॉलेज- ऐसे पता चलता है
मानसून आया... हवा दक्षिणी-पश्चिमी हो। धरती से निकलने वाली गर्मी 200 वॉट प्रति वर्ग मीटर से कम हो। जमीन से 4 से 5 किमी ऊपर नमी हो। बारिश लगातार हो।

अलर्ट- आज यहां बारिश
आलीराजपुर, अनूपपुर, बड़वानी, बैतूल, छिंदवाड़ा, डिंडोरी, हरदा, जबलपुर, झाबुआ, खंडवा, खरगोन, नरसिंहपुर, सिवनी में रविवार को तेज बारिश के आसार।

भोपाल: शाम को कई इलाकों में हुई बारिश, 3.1 डिग्री गिरा पारा
मानसून की आहट से शहर का मौसम इन दिनों हर शाम बदल जाता है। शनिवार को भी दोपहर तक तो तेज धूप चटकी लेकिन शाम साढ़े 4 बजे तक घने बादल छा गए। शहर के कई इलाकों में करीब 20 मिनट तक बूंदाबांदी हुई। शनिवार को दिन का तापमान, यह शुक्रवार के मुकाबले 3.1 डिग्री कम रहा। मौसम वैज्ञानिक उदय सरवटे ने बताया कि इस दौरान हवा का रुख उत्तर-पश्चिमी था। उत्तर पश्चिमी मप्र में बने हवा के चक्रवाती घेरे के कारण नमी में इजाफा हुआ है।

छत्तीसगढ़:बिलासपुर-रायगढ़ तक पहुंचा

राजधानी रायपुर में सक्रिय मानसून शनिवार को आगे बढ़ते हुए बिलासपुर, जांजगीर चांपा और रायगढ़ के कुछ हिस्सों तक पहुंच गया। इन इलाकों में बारिश शुरू हो गई है। उत्तरी छत्तीसगढ़ के जिन हिस्सों में मानसून अभी नहीं पहुंचा है वहां भी प्री-मानसून की वर्षा होने लगी है। अगले एक-दो दिन में पूरा छत्तीसगढ़ दक्षिण-पश्चिम हवा के प्रभाव में रहेगा। गुरुवार को मानसून ने बस्तर में दस्तक दी और 48 घंटे के भीतर वह बस्तर से बिलासपुर तक पहुंच गया। मानसूनी गतिविधियां तेज हैं। इसलिए अगले एक-दो दिन में दक्षिण-पश्चिम हवा पूरे छत्तीसगढ़ में सक्रिय हो जाएगी।राजधानी में शनिवार-रविवार को शाम-रात में गरज-चमक के साथ वर्षा होने की संभावना है।

बिहार:भागलपुर के रास्ते मानसून पहुंचा, 18 तक पूरे प्रदेश में छाएगा

भागलपुर में हुई बारिश के बाद माैसम विभाग ने शनिवार काे बिहार में मानसून के दस्तक देने की घोषणा कर दी। फिलहाल बिहार में मानसून के कवर हाेने के लिए सिस्टम बना हुआ है। अगले 24 से 30 घंटाें में पटना व इससे सटे जिलाें के साथ ही बिहार के नाॅर्थ ईस्ट के जिलाें सुपाैल, अररिया, किशनगंज, मधेपुरा, पूर्णिया, सहरसा जिलाें में मानसून की बाैछार हाेगी। पटना में भी सिस्टम बना हुआ है। बूंदा-बांदी हुई है। इससे पहले 2008 में मानसून ने 9 जून काे दस्तक दी थी।अगले तीन दिनाें तक बिहार के 38 जिलाें में गरज के साथ कहीं हल्की ताे कहीं भारी बारिश की चेतवानी दी गई है।

फोटो पटना बिहार की है।

पहले 10 जून थी आने की तिथि, 60 साल बाद बदलाव
बिहार में पहले आने की तारीख 10 जून थी। पर मानसून तय वक्तपर नहीं आ रहा था। इस साल माैसम विभाग ने 60 साल के आंकड़े को परखा, फिर तरीख में बदलाव हुआ। बिहार में 15 जून के बाद तय की है। 2002 से लेकर 2019 तक इन 18 सालाें में केवल चार साल ही ऐसा रहा जब मानसून ने 10-11 जून या इससे पहले दस्तक दी। 2017 से 2019 की बात करें ताे मानसून ने 20 जून के बाद दस्तक दी है।


झारखंड: संथाल के रास्ते मानसून की एंट्री 24 घंटे में पूरे राज्य में छा जाएगा

झारखंड में तय समय से दाे दिन पहले ही मानसून ने दस्तक दे दी है। शनिवार काे संथाल परगना और पूर्वी सिंहभूम के रास्ते मानसून ने झारखंड में प्रवेश किया। अगले 24 घंटे के भीतर यह पूरे राज्य में छा जाएगा। माैसम विभाग के निदेशक डाॅ. एसडी काेटाल ने मानसून के आगमन की घाेषणा की। उन्हाेंने बताया कि पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला खरसावां, धनबाद, जामताड़ा, देवघर, दुमका, गोड्डा, पाकुड़, साहिबगंज, खूंटी जिले में मानसून प्रवेश कर गया है। गुमला, हजारीबाग व गिरिडीह के कुछ हिस्सों में भी मानसून की बारिश हाे रही है।

जमशेदपुर में मानसून की पहली बारिश।


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फोटो भोपाल के बड़े तालाब की है। शनिवार को शहर में आंधी के साथ हल्की बारिश हुई। फोटो-अनिल दीक्षित


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पद्मश्री ओलिंपियन दीपिका कुमारी 30 जून को रातू चट्‌टी (रांची) स्थित अपने पैतृक आवास में अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज अतनु दास के साथ सात फेरे लेंगी। जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा कन्यादान करेंगे। कोरोना महामारी काे देखते हुए खास लोगों को शादी में आमंत्रित किया जा रहा है।

इनमें झारखंड की राज्यपाल द्राैपदी मुर्मू, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के अलावा डीजीपी, मुख्य सचिव, सुदेश महतो समेत अन्य हस्तियां शरीक होंगी। इसके अलावा दीपिका के पांच साथी खिलाड़ी व कोच को भी विवाह कार्ड भेजकर निमंत्रण दिया जाएगा।

सुरक्षा कारणों से पुलिस ने बुकिंग रद्द कर दी

उल्लेखनीय है कि दीपिका-अतनु की शादी डोरंडा स्थित खुखरी गेस्ट हाउस में होनी थी, लेकिन काेरोना संकट और लॉकडाउन में सुरक्षा कारणों से पुलिस ने बुकिंग रद्द कर दी थी। इसलिए अब परिवार वालों ने रातू स्थित घर में शादी के आयोजन का निर्णय लिया है।

दोनों की सगाई भी 10 दिसंबर 2018 को घर में ही हुई थी।परिजनके अनुसार, 15 जून को तिलक की रस्म होगी। इसके लिए दीपिका के पिता शिवनारायण, भाई छोटू, पंकज सोनी के साथ 5 लोग अतनु के कोलकाता स्थित आवास जाएंगे। 16 जून से कार्ड बांटे जाएंगे। महज 35 से 40 लोगों को ही कार्ड भेजे जाएंगे। धोनी के शादी में आने की पूरी संभावना है।

26 साल की हुईं दीपिका

दीपिका ने शनिवार को रातू स्थित अपने घर पर 26वां जन्मदिन मनाया। कुछ खास मेहमानों के सामने बर्थडे केक काटा। इस दाैरान उनके माता-पिता, भाई-बहन आदि मौजूद थे। भारतीय तीरंदाजी संघ के अध्यक्ष अर्जुन मुंडा सहित कई लोगों ने दीपिका को फोन पर बधाई दी।

शादी की खरीदारी कर लौट रहीं दीपिका के मां से चेन छिनी

दीपिका की शादी की खरीदारी कर रांची शहर से लौट रहीं दीपिका की मां गीता देवी के गले से बाइक सवार दो अपराधियों ने सोने की चेन छीन ली और फरार हो गए। घटना शनिवार दोपहर 2.30 बजे रातू थाना क्षेत्र के तिलता में सोडा फाउंटेन रेस्तरां के पास घटी।

पिता शिव नारायण के अनुसार, चेन की कीमत करीब डेढ़ लाख होगी। वह पत्नी के साथ शादी के सामान खरीदने के बाद बाइक से घर लौट रहे थे। इधर, रातू थानेदार राजीव रंजन लाल ने बताया कि इस बारे में अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज दीपिका के परिजनने रातू थाने में एफआईआर दर्ज कराई है।



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दीपिका ने रातू स्थित अपने घर पर जन्मदिन मनाया। इस मौके पर माता-पिता और उनके भाई-बहन समेत कुछ मेहमान मौजूद थे।


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कोरोना संक्रमण काल में गर्मी की छुटि्टयां बिताने के लिए स्पेन के लोगों ने अनोखा तरीका ढूंढ़ निकाला है। इस बार लोगों ने ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने का मन बनाया है। स्पेन में पिछले कुछ सालों में दोस्तों और परिवारों के साथ वीकेंड या छुट्टियां बिताने के लिए ‘कंट्री हाउस’ काफी लोकप्रिय हो रहे हैं।

देशभर में ऐसे 15 हजार से ज्यादा ग्रामीण घर हैं और यह हर तरह से पारंपरिक स्पैनिश छुट्टियां बिताने की जगह बन चुके हैं। इन गर्मियों में भी स्पैनिश लोग रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट की भीड़ से बचने, कोरोना से सुरक्षा और आर्थिक कारणों से भी छुट्टियां बिताने के लिए ऐसे ही कंट्री हाउस की बुकिंग करवा रहे हैं।

कंट्री हाउस की 7 हजार से ज्यादा बुकिंग अभी से ही हो गई

स्थिति यह है कि जुलाई में शुरू होने वाले सीजन के लिए कंट्री हाउस की 7 हजार से ज्यादा बुकिंग अभी से ही हो गई है जोकि पिछले साल की अपेक्षा 25% ज्यादा है। दुनियाभर में कोरोनावायरस के खतरे की वजह से पर्यटन उद्योग ठप पड़ा है, वहीं स्पेन में सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने कुछ सावधानी के साथ ग्रामीण पर्यटन को फिर से शुरू करने को हरी झंडी दे दी है।

हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री यानी आतिथ्य उद्योग स्पेन के प्रमुख सेक्टर्स में एक है। 2019 में इस इंडस्ट्री ने अपना ही रिकॉर्ड तोड़ते हुए लगातार 7 वें साल 8.37 करोड़ पर्यटकों का रिकॉर्ड बनाया था। हालांकि, इस साल ऐसा संभव होता नजर नहीं आ रहा, लेकिन इसका समाधान ग्रामीण पर्यटन के रूप में नजर आ रहा है।

लोग अपनी छुट्टियों के लिए पसंदीदा फार्म हाउस ढूंढ़ सकते हैं

यहां ऐसे कई प्लेटफार्म हैं, जहां पर लोग अपनी छुट्टियों के लिए पसंदीदा फार्म हाउस ढूंढ़ सकते हैं और बुक कर सकते हैं। एक ऐसी ही वेबसाइट पर 29 अप्रैल से 5 मई के बीच सप्ताहभर में ही आगामी जुलाई और अगस्त के लिए 7 हजार से ज्यादा बुकिंग हो गई हैं।

कंपनी के प्रवक्ता मिरयम तेजादा का कहना है कि लोगों को अब ग्रामीण पर्यटन के रूप में सुरक्षित और सस्ता तरीका मिल गया है। इससे वे अपने देश को और बेहतर तरीके से जान सकेंगे।

फ्रांस, इटली, ब्रिटेन समेत यूरोप के कई देशों ने सीमाएं खोलीं

कोरोना से डरे यूरोप के कई देशों ने कारोबारी, शैक्षणिक, यातायात और पर्यटन गतिविधियां रोक दी थीं। सीमाएं भी सील कर दी थीं। अब फ्रांस, इटली, ब्रिटेन, नीदरलैंड, फिनलैंड और ग्रीस ने सीमाएं खोल दी हैं जबकि सबसे ज्यादा मौतों के मामले में छठे स्थान पर रहने वाला स्पेन 1 जुलाई से दुनियाभर के पर्यटकों के लिए अपने दरवाजे खोल रहा है।



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जुलाई में शुरू होने वाले सीजन के लिए कंट्री हाउस की 7 हजार से ज्यादा बुकिंग अभी से ही हो गई है जोकि पिछले साल की अपेक्षा 25% ज्यादा है।


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